शनिवार, सितंबर 9

मेरी कलम

 

पहले लिखा करती थी,
आजकल नहीं लिखती,
पड़ी रहती है थकी-थकी सी, सेहमी सी, यह कलम,
आजकल नहीं लिखती। 

बहोत बोझ है कन्धों पे इन दिनों,,
इतने मसले, इतने मुद्दे,
समझ ही नहीं पा रही है,
किसे बाद में और किसे पहले लिखे?

बच्चों की बेहाली लिखे या बुज़ुर्गों की,
फिर सोचा बच्चों की आवाज़ बने,
फिर उलझ गयी बेचारी,
दरिया में मरते, अस्पताल में या स्कूल में  मरते बच्चों की आवाज़ बने?


सदमे में है कुछ वक़्त से,
बड़ी-बड़ी कलमों को बिकते हुए देख कर,
और वो जो बिकी नहीं,
उनमें से कुछ को टुकड़े-टुकड़े देख कर!,


दुःखी है उन बड़ी कलमों को देख कर,
जो अंदर से खोकली हो गयी हैं,
जिनके ज़मीर बीमार हो गए हैं,
कई को कतई दोगली हो गयी हैं। 

आज कुछ कदम चली है, पर फिर बैठ गयी है,
अपनी लाचारी पे शर्मिंदा है,
जहाँ तेज़तर्रार कलमें बेबस हैं,
लफ़्ज़ों का पेशा आजकल ज़रा गन्दा है!

पहले लिखा करती थी,
आजकल नहीं लिखती,
पड़ी रहती है थकी-थकी सी, सेहमी सी,
यह कलम आजकल नहीं लिखती। 
 

रविवार, जुलाई 2

 
 
उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब,
इसमें कोई शक़ नहीं,
मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का,
किसी को हक़ नहीं!
 
 

मंगलवार, अप्रैल 18

दिल्ली, सर चढ़ा है तेरा जादू


मुसलसल हलकी-हलकी हुड़क है,
तेरी सम्त जाती मेरी हर सड़क है,
मेरी कायनात का मरकज़ है तू

आरज़ू शब-ओ-रोज़ है तेरी,
तू माशूका नहीं, कोई नशा नहीं,
ये तिश्नगी क्या, ये तलब क्यों?

मेरे लफ़्ज़ों में तेरी रूह,
मेरे ख्यालों में तेरी ख़ुशबू ,
तेरे असर के बिना मैं क्या हूँ?

तेरी धुप की मिठास और थी,
उन सर्द रातों की बात और थी,
यहाँ हवाओँ में कहाँ वो जुस्तजू!

खुला आसमाँ है मेरा क़ैदख़ाना,
मेरी आरज़ू सरज़मीं से जुड़ जाना,
मैं बेबस आज़ादी की क़ैद में हूँ,

यह ज़मीं ज़रखेज़ सही,
मगर है तो गैर मिटटी ही,
मैं इसमें अपनी हस्ती कैसे ढूँढू?



एक ख़्वाहिश भिनभिनाती रहती है,
चल वापस चल, दोहराती रहती है,
दिल्ली, यूँ सर चढ़ा है तेरा जादू 

शनिवार, अप्रैल 15

दूर चले गए


मेरा नाम जपते-जपते,
वो मुझसे दूर चले गए,
मुझे अपनी पसंद में ढालते -ढालते 
मेरे वजूद से दूर चले गए...

मुझे बेचते-बेचते,
वो कहाँ से कहाँ चले गए,
मैं यहाँ इंतज़ार में हूँ उनके,
जो घर से मेरे दूर चले गए...

मेरी मुहोब्बत बांधते-बांधते,
मज़हबी नामों-ओ-इमारतों में,
वो आज़ादी-ए -मुआफ़ी से
बहोत होते दूर चले गए...

मैं आवाज़ देते-देते,
थक गया हूँ उन्हें,
मेरे नाम से जो बुलाते हैं दूसरों को,
वो ख़ुद क्यों मुझसे दूर चले गए?

शायद मुझे ढूँढ़ते-ढूँढ़ते,
मेरी पहचान ही भूल गए,
मैं तो सबका हूँ, सब मेरे,
वो मेरी सच्चाई से दूर चले गए....!


शुक्रवार, जनवरी 13

सीरिया!

 
 इंसानियत की यह हालत नहीं सही जाती,
अलेप्पो से आती चीखें नहीं सुनी जाती,
बच्चों की बिलखती तस्वीरें देखी नहीं जाती,
मुझ से होश की ज़िन्दगी जी नहीं जाती, 
 
मज़हबी दायरों में दीन मिलता नहीं ,
सियासतदानों से रहम मिलता नहीं ,
दर-दर ढूँढ़ते हैं, हरम मिलता नहीं ,
इन बेबसों को अक्सर करम मिलता नहीं
 
लिखा कई बार पहले भी इस बारे,
सब के सब लफ्ज़ हैं हारे,
बड़ी हैं लहरें, दूर हैं किनारे,
लाडली, आज तेरे सारे  हमदर्द हैं बेचारे!
 
 इंसानियत का दिल कब तक देह्लेगा?
ये जहाँ फेसबुक से कब तक बहलेगा?
यह ज़ुल्म कब तक चलेगा?
सीरिया, तेरा परचम कब तक जलेगा?

मुझे सेल्फी/फेसबुक में रहने दो,
मसरूफियत का बहाना बनाने दो,
अपनी खुदगर्ज़ी में रमने दो,
मुझे बस ऑंखें मीचे रहने दो
 

मेरी कलम

  पहले लिखा करती थी, आजकल नहीं लिखती, पड़ी रहती है थकी-थकी सी, सेहमी सी, यह कलम, आजकल नहीं लिखती।  बहोत बोझ है कन्धों पे इन दिनों,, ...