रविवार, जुलाई 2

 
 
उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब,
इसमें कोई शक़ नहीं,
मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का,
किसी को हक़ नहीं!
 
 

मेरी कलम

  पहले लिखा करती थी, आजकल नहीं लिखती, पड़ी रहती है थकी-थकी सी, सेहमी सी, यह कलम, आजकल नहीं लिखती।  बहोत बोझ है कन्धों पे इन दिनों,, ...