शनिवार, नवंबर 4

इंतज़ार-ऐ-असर-ऐ-दुआ में हूँ

मायूसी और फिर लड़ने की जुस्तजू,
दर्द और उम्मीद के बीच सफर में हूँ,
दायरा सिमटा है बस, बंदी नहीं हूँ।  

थक जाता हूँ तो रो लेता हूँ,
उसकी मोहब्बत याद कर मुस्कुराता हूँ,
दरारें पड़ीं हैं, अभी टूटा नहीं हूँ।  

सवाल, सलाह, नसीहत, और इल्ज़ाम,
सुन रहा हूँ हर बात, हर कलाम,
ख़ामोश हूँ, पर लाजवाब नहीं हूँ।  

डर के अँधेरे में है चराग़-ऐ -ईमान,
सर झुका है, हाथ देखते हैं आसमान,
बस इंतज़ार-ऐ-असर-ऐ-दुआ में हूँ।  
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