शनिवार, जुलाई 19

और कोई बात नहीं...


हाँ, जानती हूँ चलते रहना ज़रूरी है,
यह ज़िन्दगी सीधे-सपाट रास्ते ढूंढ नहीं पाती,
बस और कोई बात नहीं …

बाक़ियों के साथ मिलके चलना चाहती हूँ तो हूँ,
मेरी सोच अक्सर मुझसे बहोत दूर है निकल जाती,
बस और कोई बात नहीं …

दुनिया-भर में घूमती-फ़िरती हूँ  मगर,
कभी-कभी खुद से खुद का फ़ासला तय कर नहीं पाती,
बस और कोई बात नहीं …

सब कहते हैं बहोत बोलती हूँ मगर,
दिल की गहराई को आवाज़ नहीं दे पाती,
बस और कोई बात नहीं …

यूँ तो बढ़ रही तादाद दुनिया में हर दिन,
आजकल यह पहले जैसे बन्दे पैदा कर नहीं पाती,
बस और कोई बात नहीं …

जंग पहले भी हुआ करती थी मगर,
अब यह नन्हे-मुन्नों को भी है ज़िबा कर जाती,
बस और कोई बात नहीं …

सब के लब पे अमन तो है मगर,
अक्सर खुदर्ज़ी है बाज़ी मार जाती,
बस और कोई बात नहीं …

दिल चाहता है तोड़ दूँ नफरत की दिवारों को,
मेरी कोशिशें एक ईंट भी गिरा नहीं पाती,
बस और कोई बात नहीं …

वो इस दुनिया को जन्नत बना तो सकता है मगर,
फिर जन्नत की कोई ज़रुरत रह नहीं जाती,
बस और कोई बात नहीं …