मंगलवार, दिसंबर 31

नयी तारीख़: Happy New Year!

एक और नया साल, नयी तारीख़,
कल कि तारीख़, आज बन गयी तारीख़,

क्या इस नए साल में लिख सकेंगे हम,
एक नयी तारीख़?

या फिर पुराने रंग-ढंग में ही,
डूबी रहेगी यह भी तारीख़?

औरत को इज़ज़त, ग़रीब कि ख़िदमत,
क्या देख पाएगी हमारी तारीख़?

कह रहें हैं आम आदमी का ज़माना आ गया है,
क्या सचमुच आम आदमी को उठता देखेगी तारीख़?

जब एक आदमी चढ़ता है तो आम नहीं रहता,
क्या आम आदमी कि भीड़ को ऊंचाई पे देख पाएगी तारीख़?

इतिहास में मरने-मारने कि बड़ी कहानियाँ हैं,
क्या एकता और इंसानियत को हीरो बनाएगी नयी तारीख़?

नए साल कि शुभकामनाएँ आज कि पीढ़ी को,
जो लिखेगी बड़ों के आशीर्वाद से एक नयी तारीख़। 

फ़ोटो: फेसबुक 


शुक्रवार, दिसंबर 27

बातों की ईमारत

कंट्रीट कि नहीं,
वो बनाता है बातों की ईमारत,
बातें भी ऐसी जो
वक़्त-बे-वक़्त बदल जातीं हैं,
खोकली बातें,
सिर्फ बातें ही बातें,
अहंकार कि बातें,
दूसरों को नीचा दिखाने वाली बातें,
दिल को दुःखाने वाली बातें,
मगर उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता,
वो बड़ी शिद्दत से बात पे बात रखता है,
एक मंज़िल पे दूसरी मंज़िल बनाता  है,
कमरों में कुर्सी-मेज़ भी बातों कि बना लेता है,
मीठी बातों से जब चाहे बिठाता है,
कड़वी बातों से जब चाहे ठोकर मार देता है,
बड़ी दिलकश ईमारत बनाता है बातों की,
लोग खिचें चले आते हैं,
मगर सिर्फ बातों के दम पर कब रिश्ते टिका करते हैं?
बातों के फर्श पर क़दम रखते ही,
लोग मुँह की खाकर गिरा करते हैं,
हाँ, दूर से यह ईमारत बड़ी अच्छी लगती है,
शुरू शुरू में तो बातें भी मीठी ही होती हैं,
बातें इतनी और इतना बदलतीं हैं के,
ईमारत पूरी होने का नाम ही नहीं लेती,
बातें बस चलती रहती हैं,
कभी उससे, कभी इससे,
भोले और भले लोग सुना भी करते हैं,
कुछ थक गए हैं,
सुनते सुनते,
बेइज़त होते होते,
बातों की ईटें बड़ी ज़ोर से लगतीं हैं,
उम्र लग जाती है ठीक होते होते,
और जब ज़ख्म बार बार दिया जाए तो,
नए ज़ख्मों और नासूरों के बीच,
साँस लेना भी मुश्किल हो जाता है,
इस सब से बेख़बर,
वो अपनी बातों की ईमारत बनाता  रहता है,
एक नहीं तो दूसरा मेहमान आ ही जाता है,
वो नए सिरे से फिर से एक एक कमरा बनाता है,
ईंटे अक्सर वही पुरानी रहती हैं,
फिर ईंट पे ईंट लगाता है,
बात पे बात बिठाता है,
जब तक मेहमान सुनता है,
ईटें ईमारत बनाने के काम आतीं हैं,
अगर मेहमान ने शक ज़ाहिर किया,
या कोई सवाल किया,
ईंटे मेहमान के उप्पर फेंकने के काम आती हैं,
यह बातों कि ईमारत हर रोज़ बन रही है,
हर रोज़ कोई न कोई ज़ख़्मी हो रहा है,
कोई पहली बार,
कोई बार-बार ज़ख़्मी हो रहा है,
कहीं ऐसा न हो के यह बातों की ईमारत
खुद उसके उप्पर ही गिर जाए एक दिन,
या शायद गिरने ही लगी है,
ईंटों के निशाने भी चूकने लगे हैं,
उसे अब बातों की ईमारत बनाने काम बंद कर देना चाहिए,
इसमें इतना मुनाफ़ा नहीं है,
पत्थरों पर इतनी मेहनत करता है,
दिल में इतनी कड़वाहट भरता है,
इतनी बड़ी ईमारत बनायी है,
मगर देखो कोई साथी नहीं है जो इसमें रह सके,
और फिर बातों कि ईमारत पे बार बार,
झूट का सीमेंट भी लगाना पड़ता है,
जज़बातों का बड़ा खर्चा  होता होगा,
कोई उससे कहे के,
बातों कि ईमारत कि जगह
एक बाग़ बना,
सच्चाई कि ज़मीन पे
मोहब्बत के पौधे उगा,
माफ़ी और रहमदिली से उन्हें सींच,
खोकली बातों की ईंटों को,
अच्छे कामों के फल और फूलों से बदल ले,
फिर जो मेहमान तेरे आँगन आएँगे,
तुझे अकेला छोड़ कभी न जाएँगे,
यह बातों की ईटें,
तेरे दिल को भी पत्थर बना रहीं हैं,
और पत्थर के दिल में कोई ज़यादा देर नहीं रहता,
और ना ही बातों की ईमारत में।

शुक्रवार, दिसंबर 20

सुन



तू तस्सली रख,
उम्मीद पे नज़र अपनी रख,
अपनी मंज़िल पे ध्यान रख,
होठों पे मुस्कराहट अपनी रख

कोई रोक सके न तेरे कदम,
कोई साथ रहे न रहे, साथ रहेंगे हम,
गुस्से को भूल के, दिल में अपने बस ख़ुशी रख

हाँ, दर्द होता है,
जब कोई अपना ही बेदर्द होता है,
तू अपने हमदर्दों से दोस्ती रख

आंसूं पी के, मस्त धुन सुन,
अपने मासूम सपनों को बुन,
अपना सर ऊँचा और कामों में भलाई रख

बुराई जो करीब आये तो दिल में न आने दे,
मिले मुहोब्बत तो ज़हन में उतर जाने दे,
दिल कि एक जेब में अच्छाई और दूसरी में सच्चाई रख 

आएगा एक दिन तेरे पास, वो जो दूर खड़ा है,
पहले जो लगाएगा  गले, जान ले, वही बड़ा है,
मुठ्ठी में अपनी सदा माफ़ी रख