बुधवार, जून 13

भाई

तेरी आँखों में आंसूं भी देखें हैं,
और उनमें मुस्कराहट भी देखी है,
दोनों तोड़ देतें हैं तेरी आखों के बांध
और बहा लातें है बड़ी शिद्दत से तेरे जज़्बे को


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तेरी बातें भी सुनी हैं,
तेरी चुप्पी भी सही है,
जब तू कहता है तो कहता है
जब नहीं कहता तो बहुत कुछ कहता है


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वो बचपन का दिन-रात का साथ भी जिया है,
और सालों से सात समंदर की दूरी भी जी है,
तेरे दिल के दर्द को अपनी आँखों में पाया है
मेरे दिल के बोझ को तेरे कन्धों पे पाया है 



मंगलवार, जून 12

उसके क़दमों में सर मेरा, मेरा गुरुर है


चाहे ज़रा मैली भी हो,
मुझे मेरी सच्चाई ही मंज़ूर है

कहाँ तक साथ देगा धुंआ?
एक दिन तस्वीर साफ़ होती ज़रूर है

यूँ तो खुद्दार हूँ, सर उठा के चलने की आदत है,
उसके क़दमों में सर मेरा, मेरा गुरुर है

मज़हब तो समझता है, गर हमदर्दी भी समझ जाए,
तो पिघल जाए वो रहनुमा जो अभी मगरूर है


तहज़ीब-ओ-अदब जानता है सारे, माना
इंसान को गले लगाने का क्या तुझे शहूर है?


बैठ कुछ देर गरीब की कुटिया में और ढूंढ उसकी आँखों में,
पा लेगा उस खुदा को जो तेरे महल से ज़रा दूर है


शुक्रवार, जून 8

मुसलसल दर्द का ज़ाएका मीठा हो जाता है,

ख़त्म हो जाए तो कुछ कमी सी लगती है

सोचूँ खुशियाँ सारे जहां की मगर,

ख्याल-ए-उल्फत नम हो जाए तो कुछ कमी सी लगती है

दिल्ली, सर चढ़ा है तेरा जादू

मुसलसल हलकी-हलकी हुड़क है, तेरी सम्त जाती मेरी हर सड़क है, मेरी कायनात का मरकज़ है तू आरज़ू शब-ओ-रोज़ है तेरी, तू माशूका नहीं,...