रविवार, मार्च 20

कुछ सवाल

सीरिया, इराक हो या फिलिस्तीन का मामला, या फिर कश्मीर का मसला हो, सालों से लोग बस तड़प रहें हैं. छोटे-छोटे बच्चे ज़ुल्म और जंग में बड़े हो रहे हैं। कैसा बचपना और कैसा भविष्य? कुछ बच्चे अब जवान हो गए हैं. क्या सोचते होंगे यह दुनिया के बारे में? अब तो यह जानते होंगे के इन्हें अपने अधिकार नहीं मिले, यह जानते होंगे के जहाँ बाक़ी बच्चे अमन और शांति के बीच स्कूल जाते हैं, बागों में खेलते हैं, दलेरी से किसी से भी मिलते हैं वहां ये और इनके परिवार के लोग रोज़-रोज़ मर मर के जीते हैं. इनमें  से कितनो ने अपने बाबा को क़त्ल होते देखा होगा, कितनो ने माँ की आबरू को उजड़ते देखा होगा. इनमें से कितने दुखी होते होंगे, या कौन-कौन गुस्से से भर जाते होंगे? इन देशों की सरकारें इन बच्चों और जवानों के लिए क्या कर रही हैं?

और औरतों  की तो क्या बात की जाए...! इनके दुखों की तो कोई गिनती ही नहीं है। कभी घर से बेघर, कभी पति के होते पति से दूर या फिर विधवा का जीवन, बच्चों और बुज़र्गों का पालन-पोषण, कभी मानसिक शोषण, कभी बलात्कार,  कभी भुकमरी और कभी एक ही औरत को ये सब बर्दाश्त करना पड़ता है। न जाने किस-किस तरह के बलिदान करने पड़ते हैं। अक्सर यह सब ख़ामोशी से सहना पड़ता है क्यूंकी ज़बान खोलने की सज़ा अलग से मिलती है। सच तो यह की एक औरत की ज़िन्दगी कहीं भी क्यों न हो, आसान नहीं होती मगर हिंसक संघर्ष में औरतें तो जैसे इस दुनिया में नरक भोगती हैं। 

जब कभी भी इन जगहों के बारे में पड़ती या सुनती हूँ, दिल सवालों से भर आता है।  मगर सिर्फ सवालों से किसका पेट भरता है? काश हम इन लोगों की लिए कुछ कर पायें! पर हमें नारों और बातों में मज़ा आता है, बैठे-बैठे ऊँगली उठाने में मज़ा आता है... अगर हमारी सोच किसी नहीं मिलती तो उन्हें ज़लील करने में मज़ा आता है... कुछ करने लिए साथ चलना पड़ेगा, एक दुसरे को सुनना पड़ेगा, एक दूसरे का साथ देना पड़ेगा... खाकी निक्करधारी का भी आदर करना पड़ेगा और सफ़ेद टोपी वाले की भी इज़्ज़त करनी पड़ेगी... शोषित औरत में माँ ढूंढ़नी होगी और पराये बच्चे में में अपनापन पाना होगा... उफ़... बड़ा मुश्किल है ये सब। किसके पास वक़्त इस सब के लिए? अजी छोड़ें ये सब, फिर ढूंढे कोई मुद्दा एक दुसरे की बेइज़्ज़ती करने का, ऊँगली उठाने का... ये लोग हर रोज़ मर रहें तो मरा करें...! 

यह कुछ सवाल उससे हैं जो ऊपर से सब देखता है, कहीं दुआ सुनता है मगर कहीं मजबूर सा नज़र आता है.... 


क्यों यह मसला सुलझता नहीं है?
क्या कोई तरीका नहीं है?
क्या तेरा दिल पिघलता नहीं है?
http://www.un.org/apps/news/story.asp?NewsID=48341#.Vu8qLMcaxng

पिघलता है तो क्यूँ कुछ बदलता नहीं है?
या फिर कोई तेरी सुनता नहीं है?
बन्दुक छोड़, इनका हाथ दुआ में क्यों उठता नहीं है?
http://www.un.org/apps/news/story.asp?NewsID=48341#.Vu8qLMcaxng

क्यों इनका सर शर्म से झुकता नहीं है?
अब शायद हर कोई तुझसे डरता नहीं है.
तू खुद ही कुछ क्यूँ करता नहीं है?
क्यों लोगों को हमदर्दी से भरता नहीं है?
क्यों बातचीत से मसला सुलझता नहीं है? 
क्यों अमन से नाता इनका जुड़ता नहीं है?
http://www.cbc.ca/radio/thecurrent/the-current-for-june-18-2015-1.3118206/lifeline-syria-aims-to-bring-1-000-refugees-to-toronto-1.3118254


इन बागों में क्यों गुल-ए-उम्मीद खिलता नहीं है?
क्यों बचपन को खिलने मौका मिलता नहीं है?
http://worldnewsnetwork.co.in/the-pain-of-dardpora-kashmiri-half-widows-living-in-a-state-of-limbo/
क्यों मांओं का आँचल खिलखिलाता नहीं है?
मानवाधिकारों  की जैसे कोई मान्यता ही नहीं है!
प्यार काफ़ी है, कोई क्यों समझता नहीं है?

मंगलवार, फ़रवरी 16

ठहरो ज़रा

मेरी दिल्ली फिर जल रही है,
यहाँ दूर बैठे मेरा दिल बैठा जा रहा है
यह भारत माँ का लाडला,
माँ की बर्बादी क्यों गा रहा है?
वो न्याय के लिए लड़ने वाला,
न्याय को ही क्यों हरा रहा है?
दुनिया की ख़बर सुनाने वाला आज,
पिट कर खुद ख़बरों में आ रहा है?
ये पोलिस वाला चुप क्यों है,
जनता को नहीं,
तो यह किसे बचा रहा है?
और इस सब तमाशे के बीच,
वहां सीमा पर जवान अपनी जान गँवा रहा है!
रुक जाओ टटोलो खुद को, शायद
तुम्हारे अंदर एक इंसान मरा जा रहा है....
ठहरो ज़रा, थम के सोचो तो,
ऐसे में भारत का भविष्य कहाँ जा रहा है?
समझदार हो, अमन से करो जतन ,
देखो, आने वाला कल तुम्हे बुला रहा है।

शुक्रवार, जनवरी 8

जाने दो


क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो,
क्यों किस्मत से लड़ते हो?
जाने दो...

फिर हिंदुस्तान को तरसोगे ,
फिर यादों के जंगल में भटकोगे,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

क्यों वक़्त अपना ज़ाया करते हो,
क्यों वही पुरानी ख़्वाहिश करते हो
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

बारिश में फिर अपनी मट्टी की खुशबू ढूँढोगे,
बूँदों की आड़ में खुद भी धीरे-धीरे बरसोगे,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

फिर खलेगा गैर-ज़बान में बतियाना,
जज़्बातों का अंग्रेजी से आँख चुराना,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

फिर माँ की रसोई बुलाएगी,
फिर पिज़्ज़ा की शकल रुलाएगी,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

हथेली में भाई की उँगलियाँ याद आएँगी,
खाली-पीली फिर आँखें भर आएँगी,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

वो दिल्ली जो बस्ती है यादों में, अब नहीं है,
वो जादू, वो दौर, वो लम्हें, अब नहीं हैं,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

हाँ, यादों की धूल आज भी सड़कों पे पड़ी होगी,
हर मोड़ पे माज़ी की कोई तस्वीर जड़ी होगी,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

इंडिया गेट, नई दिल्ली फोटो क्रेडिट- अंजना दयाल दे प्रेविट 

फिर दिल्ली की सड़कों को ललचाओगे,
यहाँ तक के सफर को फिर पछताओगे,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

बचपन ने जिसे रंगा था, वो तितली अब कहाँ मिलेगी?
भीगी थी जिसमे जवानी, वो बदली अब कहाँ मिलेगी?
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

इस दर्द  को यूँ ही ख़ामोश लहू में बहने दो,
याद-ए-सरज़मीं  को यूँ ही चुपचाप सिसकने दो.
जाने दो,
क्यों अपनी ही हस्ती से लड़ते हो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?
जाने दो....

शुक्रवार, जनवरी 1

मेरी दुआ


2016 आप सभी के लिए मंगलमय हो और ईश्वर से मेरी यही प्राथना है हम सबको अपनी उपस्थिति से भर दे।  आप जो भी हैं, जैसे भी हैं, किसी भी धर्म के मानने वाले हैं, वो आपको बहुत प्रेम करता है। पूरे विश्वास के साथ उस की ऒर देखें, वो आपको अपनी शान्ति से भर देगा। खुश रहें और खुश रखें! :-) :-)

तुझे सोचूं, तुझे देखूं,
तुझे ढूढूं, तुझे पाऊँ।

तू मंज़िल हो हर क़दम की
हर मुकाम पे तुझे पाऊँ।

होंगे और भी खूबसूरत मज़मून,
मैं बस तुझे गुनगुनाऊँ।

तेरी रहमत हो जाए तो,
मैं भी तेरे काम आऊँ।

अमन की कोशिशों में,
मैं भी हिस्सा बन पाऊँ।  

फोटो: गूगल 

लाया है जिसके लिए मुझे यहाँ,
उस मकसद को पूरा कर जाऊँ।

कुछ और नहीं, बस ईमान माँगू तुझसे,
तेरा ही चेहरा ताकूँ जब-जब घबराऊँ।

मुश्किल में हूँ या मज़े में,
मैं हर बात में शुक्र मनाऊँ।  

ज़िन्दगी का कोई सफर हो,
तेरे पीछे-पीछे चली आऊँ।

कोई भी, कहीं भी मिले,
हर चेहरे में तुझे पाऊँ। 

बस तुझे सोचूं, बस तुझे देखूं,
बस तुझे ढूढूं, बस तुझे पाऊँ।

रविवार, दिसंबर 27

तू हर बार मिला है मुझको!

कई रास्तों पे सफर किया है मैंने,
दरिया का किनारा हो,
या समंदर की गहराई,
लम्बी-लम्बी सड़कें हों,
या बहती नदी,
अकेला रास्ता हो,
या साथ में कोई,
रात अँधेरी हो,
या हर तरफ रौशनी,
माहौल ग़मगीन हो,
या राहें हों मुस्कुरातीं,
अपनों का साथ हो,
या अजनबी से दोस्ती,
ख़ाली हाथ सहमे हों,
या जेबें हो खनकती,
बारिशों की गीली बुँदे हों,
या ठिठरती हो सर्दी,
पतझड़ का सूनापन हो,
या चमकते सूरज की गर्मी,

जब वो मुझे बारबरा बन के मिला: हैती - दिसंबर २०१५ 
हवा का झोंका बन के,
तपती गर्मी में मिला है मुझको,
पतझड़ में वो आख़री पत्ता बन के,
डाली पे झूमता मिला है मुझको,
सूरज की हिचकिचाती किरण बन के,
कांपती ढंड में मिला है मुझको,
मज़बूत झाड़ी बन के,
फ़िसलती पहाड़ी पे मिला है मुझको,
मुस्कुराहटों की गर्माइश बन के,
उलझनों की बीच मिला है मुझको,
मुख़्तलिफ़ शक्लों में मेरा हमदर्द बन के,
बोझिल रास्तों पे मिला है मुझको,
कैसा भी वक़्त हो, कोई भी हालात,
तू मेहरबाँ बन के मिला है मुझको,
कितना भी मायूस अँधेरा हो,
तू हर बार उम्मीद बन के मिला है मुझको! 

शुक्रवार, दिसंबर 11

नहीं शिकायत किसी मज़हब से मुझे,
बस कोई खुदा को अपनी जागीर न समझे,
हर इंसा को जिसने बनाया,
उसे बस अपनी बातों-ओ-किताबों में ही हाज़िर न समझे 


मंगलवार, अक्तूबर 20

आओ लौट चलें

कई न्यूज़ चैनल बदल के देख लिए, देश की हवा कुछ-कुछ बदली-बदली सी लगती है। ऐसा नहीं है  इस तरह के हादसे पहले नहीं हुए, आज भी याद है १९८४ की बर्बरता या गोधरा की मार्मिक कहानियाँ। मगर इस तरह आये दिन धार्मिक कट्टरता के किस्से पहले कभी नहीं सुने। यहाँ तक के भारत के राष्ट्रपति महोदय ने भी अपनी चिँता व्यक्त करी है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सवाल उठाये जा रहें हैं।


बड़ा अजीब लगता है जब भारत के बारे में ऐसी बातें कही जाती हैं क्यूंकि यहाँ तो, कुछ अपवादों को छोड़, सदियों से तरह-तरह के धर्म के लोग मिल-जुल के रहते रहें हैं और हम जानते है के रहते रहेंगे भी :-)


बस आजकल मन कुछ दुखी है.…  


यह ख़बरें क्यों जल रहीं हैं?
लफ़्ज़ों की तलवारें क्यों चल रही हैं?
क्या उजड़ रहा है चमन धीरे-धीरे?

नहीं, मेरा हिंदुस्तान हार नहीं सकता
भाईचारे को नफ़रत पे वार नहीं सकता,
नयी हवा से लड़ रहा है वतन धीरे-धीरे! 

हाँ, फ़ूलों  के रंग-ओ-खुशबु जुदा हैं,
मगर सब ही खूबसूरती-ए-गुलिस्तां हैं,
बात इतनी भी पेचीदा नहीं, समझेगा सनम धीरे-धीरे 

यह जज़्बात जिन्हे भूख है दरिंदगी की
क्या इनसे कम है कीमत ज़िन्दगी की?
कर रहें कई नेता इन्हें नमन धीरे-धीरे 

माँस नहीं, दाल-भात ही सही,
हाँ, और मिले सबको बराबरी  
ख़ाली बातों से हो रही है थकन धीरे-धीरे 

क़ानून हाथों में ले रहीं हैं अफ़वाहें,
इन्साफ घर में न पाएँ तो कहाँ जाएँ?
क्यों हो रहा है हक़ों का दमन धीरे-धीरे? 


रोक लो इनको,
कहो, बस करो,
अमन का करो जतन धीरे-धीरे  

छोड़ दो खोखली नफ़रत के बहाने,
कई पीढ़ी हमें यह रिश्ते हैं निभाने,
बढ़ने दो मोहब्बत की तपन धीरे-धीरे

मज़हब के नाम पे जो मचाया है  हल्ला,
नहीं मौजूद इसमें कहीं ईश्वर-अल्लाह, 
आओ लौट चलें राह-ए-दीन-ओ-धरम धीरे-धीरे 

शनिवार, सितंबर 5

सीरिया!

पिछले चार सालों से सीरिया में humanitarian crisis चल रहा है मगर हमारे world leaders हाथ पर हाथ रख कर बैठें हैं. अगर आप अपनी जान बचा कर अपने  देश से निकल आएं तो आपको शायद रिफ्यूज मिल जाए मगर गारंटी कोई नहीं है! UN Security Council की तरफ से आज तक कोई ठोस कदम नहीं लिया गया है. कितने शर्म की बात है की अन्याय बिना किसी रोक-टोक के चल रहा है और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय गहरी नींद सो रहा है… 

यह कैसा जहाँ हैं, जहाँ 
बिलखते बच्चोँ की आवाज़ पर कोई नहीं उठता?


इतनी नींद के दिन के उजाले में भी,
लुटती आबरुओं की आवाज़ पर कोई नहीं उठता! 



सब सोये हैं मुख्तलिफ नशों में धुत्त,
यहाँ गिरती लाशों की आवाज़ पर कोई नहीं उठता!



आँख गर खुल भी जाए तो करवट बदल लेते हैं,
मासूमों पे बरसती हुई गोलियों की आवाज़ पर कोई उठता! 



नहीं जानते के यह आग हमारा घर भी जला सकती है,
उस इलाक़े में जलते हुए शोलों की आवाज़ पर कोई नहीं उठता! 



खौफ और लाचारी में हज़ारों बेघर हों तो हों,
ढहते हुए मकानों की आवाज़ पर कोई नहीं उठता!



दावा ये के रहनुमा हैं दुनिया भर के, मगर 
ज़ालिम के कोड़ों की आवाज़ पर कोई नहीं उठता! 

http://www.un.org/apps/news/story.asp?NewsID=46103#.VeuuOumfvdk 

खुनी लड़ाई में सुलह कराने वाला कोई नहीं,
चटकते रिश्तों की आवाज़ पर कोई नहीं उठता!




फोटोज: गूगल 

शनिवार, अगस्त 15

दिल्ली के रंग

सभी को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें! 
फोटो: 


देखा है दिल्ली को बचपन से,
बड़ो से सुना है, किताबों में पढ़ा है,
बड़ी अदा से सलाम करती है,
हर आने वाले को,
जब तक हद से न गुज़र जाए,
बड़े सब्र से सहन करती है,
सियासत के हर पैंतरे को,
देख चुकी है,
ताकत की कई शक्लें,
सुन चुकी है,
सियासत की कई ज़बाने,
बड़ी शातिर है,
तमाशे के गुज़र जाने का
इंतज़ार करती है,
चाहे कितना भी 
डमरू बजा लो,
नहीं क़ैद कर पाओगे
इसकी रूह को,
न पोंछ पाओगे,
इसके माथे से इंकलाब को,
न तोड़ पाओगे,
एकता के धागों को,
चूड़ियाँ तो हर जगह
रंग-बिरंगी होती हैं,
अरे, इसकी तो मिट्ठी भी,
कई रंगों के ज़र्रों से बनी है,
जाने कहाँ-कहाँ की धुल,
मिल चुकी है इस ज़मीन में,
यह दिल्ली है,
खूबसूरत गुड़िआ सी दिखती है,
मगर हिंदुस्तान की शान में,
सबसे बहादुर वीरांगना है ये,
मत उलझो इससे,
यह जान पे खेल जाएगी,
अपने हर रंग के लिए,
हाँ, अगर सवांरोगे इसके रंग-रूप को,
तुम्हें सर पे बिठा लेगी,
बस, भूल न जाना साहब,
लालकिले से जो तिरंगा फहराता है,
आज भी उस में,
हरे और नारंगी की जगह,
एक बराबर है,
एक बराबर है।  

जय हिन्द!!! 


शनिवार, जुलाई 4

ऊँचाई

अक्सर हवाईजहाज़ की खिड़की से,
कोशिश करती हूँ,
नीचे ज़मीन पे ढून्ढ सकूँ,
कहाँ एक देश की सीमा ख़त्म हुई,
कहाँ दुसरे की शुरू,
सरहदें कुछ ठीक से दिखाई नहीं दीं कभी,
जब कोई शहर सा नज़र आता है,
घरों में कोई फ़र्क़ नहीं दिखता,
कौन सा हिन्दू का है या  
कौन सा मुस्लिम का,
जानती हूँ, समझती हूँ,
वहाँ नीचे, सरहदें हैं,
हिन्दू और मुस्लिम के घर भी 
अलग-अलग से दिखते होंगे,
मगर इस ऊँचाई कुछ ख़ास फ़र्क़ नहीं दिखता,
नदियाँ, पहाड़, वादियां, 
ख़ाली ज़मीन या फिर उस पर बनी 
सड़के और बिल्डिंगें दिखती हैं,
और कभी-कभी तो कुछ भी नहीं दिखता,
बादल सब छुपा देतें हैं,
लगता है यह बादल भी इतने फ़र्क़ देख नहीं पाते,
तभी तो बरसते हैं सब पर,
हिन्दू के लिए सोम और 
मुस्लिम के लिए जुम्मे का इंतज़ार नहीं करते। 
फिर सोचती हूँ,
इतनी सी ऊँचाई से,
ज़मीनी फ़र्क़ इतने फ़ीके हो जाते हैं तो,
वो जो सबसे ऊँचा है,
उसे कितने फ़र्क़ नज़र आते होंगे,
और कौन-कौन से फ़र्क़ों पे
वो तवज्जो देता होगा,
किसके घर में कौनसी किताब रखी है?
किसके माथे पे लाल टीका है 
और किसके सर पे सफ़ेद टोपी है?
कौन हरे की ओट में हैं और 
किसने पहना नारंगी है?
या फिर बस दिलों को जाँचता होगा,
वो बन्दों की सच्चाई और अच्छाई परखता होगा,
रंगों, धर्मों, और रिवाज़ों से परे,
उस ऊँचाई से वो शायद 
इंसान में बस ईमान और ईमानदारी ढूंढता होगा।  :-)