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शनिवार, अप्रैल 13

अपनी ग़लती की खबर,
दुसरे की खूबी पे नज़र,
या खुदा, कट जाये यूँ ही,
ज़िन्दगी का सफ़र… 

रविवार, फरवरी 17

हमेशा खुश रहना


आज से ठीक एक साल पहले मेरे छोटे भाई अमित की शादी दिल्ली में हुई, और हमारे घर में एक नया जन्म हुआ। हमारे परिवार को एक और बेटी मिली उसकी पत्नी के रूप में। यह रचना उसी के लिए है :-)

अम्मू - चमकी 


छम-छम करती आई चमकी,
सब के दिल को भाई चमकी,
छोटी-छोटी हथेलियों में,
ढेरों खुशियाँ भर लाई चमकी

चमका है अम्मू का जीवन,
चमका है सारा घर आँगन,
जब जब है मुस्काई चमकी

सुन्दरता में गहराई है,
सादगी बालों में पिरो लाई है,
बरकत बन कर आई चमकी

नया घर है, नया परिवार,
बाबुल का घर हर रविवार,
अपने अम्मू पर इठलाई चमकी

ज़रा से कन्धों पर बड़ी ज़िम्मेदारियाँ,
घर सँभालने की हैं तैयारियाँ,
सपने आँखों में भर लाई चमकी

एक पुरानी कहानी दोहराती है,
एहसासों की हर शै गुनगुनाती है
सुहानी यादें फिर ज़िन्दा कर लाई चमकी

मासूमियत रोम-रोम में समेटे है,
समझदारी का आँचल लपेटे है,
सबके दिल को हरने आई चमकी

उसका रहम सदा रहे तुझ पर,
उसका नूर सजा रहे तुझ पर,
रहमतों की बारिशों में भीगने आई चमकी 

सोमवार, फरवरी 4

शायर की कहानी

नींद खेले आंखमिचौनी, 
यादें करें मनमानी,
दिल दौड़े दौड़ तूफानी,
सुकून करे आनाकानी,
यही है शायर की कहानी 
शायरी की ज़ुबानी ….

बृहस्पतिवार, जनवरी 31

दिल्ली वाला दर्द

दिल्ली, तुझे छोड़ तो दिया, पर कभी छोड़ा नहीं तुझे,
पहले मेरी रिहाइश तुझ में थी, अब तू मेरे दिल में रहती है  

रेड क्रॉस की नौकरी के लिए मुझे अक्सर यहाँ-वहाँ जाना पड़ता है। दस साल पहले जब रेड क्रॉस के साथ काम शुरू किया, हर सफ़र दिल्ली से शुरू होता था और दिल्ली में ख़त्म हो जाता था। फिर ज़िन्दगी के सफ़र में कुछ ऐसे मोड़ आये की रेड क्रॉस के सफ़र अब दिल्ली में ख़त्म नहीं होते। हाँ, ख्वाहिश ज़रूर रहती है...
चार दिन पहले वाशिंगटन डीसी से केंटकी जाते हुए, जहाज़ में इस रचना से मुलाकात हुई:


फोटो: अंजना दयाल

फिर एक और सफ़र, मगर यह सफ़र भी मेरी मंजिल तक नहीं जाता,
दिल्ली आने से पहले ही रुक जाता है 

ढूँढती हैं आँखे किसी हिंदुस्तानी चेहरे को, जिससे कुछ बात कर सकूं,
फिर लिहाज़ से कुछ नहीं कहती, गर कोई मिल भी जाता है,

अक्सर दिल्ली वाले दर्द को मीठी यादों से सहला लिया करती हूँ,
छिपा लेती हूँ सबसे अगर कोई आँसू गिर भी जाता है

ये खिड़की के बाहर बादल तो किसी सिम्त के गुलाम नहीं,
क्या इन बादलों में कोई बादल मेरी सरज़मी तक भी जाता है?

यूँ तो जा रहे हैं सभी मुसाफिर एक ही मंजिल की तरफ,
यह दिल ही है जो दिल नज़रें बचा के कहीं और ही चला जाता है

किसी को दिलनशीं की याद, किसी को औलाद का ख़याल, तो किसी को माँ की फ़िक्र,
जहाज़ कहीं भी जाए, ये दिल किसी और सफ़र पे निकल ही जाता है

अब तो बादलों से भी उप्पर उड़ रहा है यह जहाज़, मगर
मेरे ख्यालों का काफिला देखो इस के भी उप्पर से जाता है,

नथ्थू की चाट, रोशन दी कुल्फी, या परांठे वाली गली की खुशबू,
शौक-ए-ज़ाएका तेरी गलियों को खिंचा चला जाता है,

पापा की बातें, ग़ालिब की शायरी, और उन हवाओं में रूहानियत,
मेरा वजूद अपने मायने ढूंढने दिल्ली ही तो जाता है

तेरी ज़मीं पे खुदा के रहम-ओ-करम को पहचाना,
मेरी दुआओं का रास्ता अब भी तेरी मिटटी से हो के  जाता है

रविवार, दिसम्बर 9

बस यूँ ही

बहोत कुछ जो दिल के बहोत करीब रहा,
मुठ्ठी से रेत की तरह बस यूँ ही रिसता रहा,

कदम बढ़ते रहे, कभी तेज़, कभी भारी,
ज़ख्म कभी भरता रहा, कभी रिसता  रहा 

मुड़ के देखा तो बहोत था जिसे सीने से लगाना चाहा,
चाह सुबकती रही, सीना भी रिसता रहा 

कभी ज़िद्द, कभी बचपना, कभी मजबूरी, कभी ताबेदारी,
फ़ैसलों की शाखों से अंजाम-ए-ज़िन्दगी रिसता रहा 

खूबसूरत है मुस्कराहट तेरी, कहके ज़माना हँसाता रहा,
तन्हाई की गहराईयों में ग़म-ए-दिल कहीं रिसता रहा 

काश बाँध तोड़ के बह जाता गुबार, पर नहीं,
रात-ओ-दिन महीन सुराखों से बैरी रिसता रहा 

हर पड़ाव पे मेरी हस्ती का कुछ सामान छुट गया,
सफ़र के दौरान मेरा वजूद कहीं-कहीं रिसता  रहा  

लिए दिल को हाथों में चलते रहे हम भी, 
उँगलियों के बीच दरारों से लहू भले ही रिसता रहा 

बेशक, वो कादिर रहा है मददगार हर कदम पे, 
थामे रहा वो हाथ मेरा, हौसला जब भी रिसता  रहा 


बुधवार, दिसम्बर 5

रचतें हैं मज़हब मेरे नाम पे किस्म-किस्म के,
पूछें तो मुझसे मेरा कोई मज़हब नहीं

शनिवार, सितम्बर 29

छोटी

आभार गूगल 


एक सहमी सी छोटी लड़की
अक्सर मेरे पास आ जाती है,
लोगों के बीच में
छुपा लेती हूँ उसे 
कभी अपनी हँसी के पीछे,
कभी हाज़िर-जवाबी की ओड़ में,
शायद ही कोई देख पाता  है उसे
पर जब कभी अकेले में मिलती है
तो हावी सी हो जाती है
ज़हन से छिपाये नहीं छिपती
मेरे ख्यालों से खेलने लगती है,
अगर-मगर की डगर पे ले जाती है,
फिर मैं अपने ख्यालों का हाथ पकड़ के 
विश्वास के शहर में ले आती हूँ,
वो ना जाने कहाँ खो जाती है,
या शायद गुड़िया बड़ी हो जाती है...