शनिवार, फ़रवरी 21

और सफर चलता रहा…

इस रचना में अपने करियर की कुछ झलकियाँ प्रस्तुत करी हैं. इन यादों को शब्दोँ में संजोना ज़रूरी है इस से पहले के ये खो जाएँ। छोटी-छोटी पँक्तियों में कई तरह के अनुभव छुपे हैं। १२ साल पहले गुजरात के भुज में भूकंप पीड़ितों के साथ काम करने के लिए रेड क्रॉस के साथ जुड़ी। तब यह नहीं जानती थी की बारह साल और दुनिया के १०० से ज़्यादा शहरों में काम करने के बाद भी में रेड क्रॉस के साथ जुड़ी रहूँगी। इस दौरान कई प्राकृतिक आपदाओं के अलावा कश्मीर और नक्सली इलाकों में भी काम किया। इन सब अनुभवों में सबसे मुश्किल था २००४ में  चेन्नई के कुम्भकोणम में उन माँओं के साथ काम करना जिनके बच्चे स्कूल में आग से जल के ख़त्म हो गए थे। उस समय मेरा बेटा भी लगभग उसी उम्र का था जिस उम्र के बच्चे उस भयंकर आग में जल गए थे। हर माँ में मैं अपने आप को देखती थी। कोई भी त्रासदी क्यों न हो, महिलाओं और बच्चों पर इसका असर और भी अधिक होता है। कश्मीर की 'half widows' की दुखभरी दास्ताँ youtube पे देखि जा सकती है। इंसान के कई रंग देखे, दर्द के कई रूप देखे मगर जीवन को हमेशा मौत से ज़्यादा ताकतवर देखा। इंसान के गिर के उठने के हुनर को कई अंदाज़ों में देखा। जब भी विनाश की तेज़ हवाओं ने उम्मीद की लौ को बुझाना चाहा, ईश्वर ने जैसे अपनी रेहमत उसे घेर लिया और शायद इसलिए ये लौ आज पहले से ज़्यादा तेज़ जलती है…

कभी अपना वतन,
कभी श्रीलंका का जीवन, 
और फिर मेरा सूरज पश्चिम में ढलता रहा

कभी हिन्द महासागर,
कभी कैरेबियाई सागर,
मेरा दिल जमना को मचलता रहा

कभी ओड़िशा में आहें,
कभी त्रस्त कुम्भकोणम की माएँ,
और कश्मीर का मसला उलझता रहा

कभी नक्सली जंगल,
कभी लंका के टाइगर,
 मन फिर भी दया से पिघलता रहा 

कभी भूकम्प की त्रासदी,
तो कभी पानी की सुनामी,
कभी माँओं का आँचल सुलगता रहा,

कभी बम-बारी के निशाँ,
कभी घरों का मलबा,
भाई का गुस्सा भाई पे निकलता रहा 

कभी बेसहारा-बेघर लोग, 
कभी ख़ाली गोद,
दर्द मुक्तलिफ़ शक्लों में मिलता रहा 

कभी साथ थे अपने,
कभी अजनबी बने अपने,
कभी अकेलापन खलता रहा

अपने कभी दूसरों के आँसूं पोंछें,
कभी जी भर के खिलखिलाए,
दिल यूँ ही बिखरता-संभलता रहा

गाँव के गाँव मिटते देखे,
शहर भी तहस-नहस देखे,
 इंसानियत के माथे पे हौसला झलकता रहा 

इन्सां में कभी शैतान भी देखा,
मगर खुदा बार-बार देखा, 
और ज़िन्दगी का सफर चलता रहा… 



मेरी कलम

  पहले लिखा करती थी, आजकल नहीं लिखती, पड़ी रहती है थकी-थकी सी, सेहमी सी, यह कलम, आजकल नहीं लिखती।  बहोत बोझ है कन्धों पे इन दिनों,, ...