शनिवार, नवंबर 11

सारा आसमाँ हूँ!

आजकल हर तरफ नफरत का बोलबाला है।  कहीं देख लें, हिंसा का कोई न कोई चेहरा नज़र आ ही जाएगा।  हैवानियत अलग-अलग लिबास में नाच रही है।  कहीं मज़हब, कहीं रंग भेद, कहीं पैसा तो कहीं सियासत! और लोग गुटों में बँट गए हैं।  दुसरे का दर्द महसूस कम होने लगा है, अपनों की ग़लतियाँ कम नज़र आने लगीं हैं।  और हाँ, अपने लोगों की परिभाषा भी जैसे बदल रही है।  पहले दोस्त, पड़ोसी, साथ में  काम  करने वाले, रिश्तेदार कोई भी अपनों की गिनती में आता था।  आज कल अक्सर मज़हब और राजनितिक राय न मिले तो आप अपने नहीं रहते। और ये हाल सिर्फ इंडिया में ही नहीं बल्कि और देशों में भी दिख रहा है... पूरा विश्व जैसे अलग-अलग गुटों में बंटता जा रहा है... लोग मिलते हैं तो फेसबुक पर, वास्तव में मिलते हैं तो आँखें नहीं मिला पाते और जो आँखें मिल जाएं तो दिल नहीं मिलते। मगर सब ऐसे नहीं हैं। जिनकी आँख उससे लड़ चुकी है, वो फ़र्क़ नहीं कर पाते :-) वो तो उनके कान में अपनी बात फूँक के, अपना जादू चला चुका!  


मैं बौद्ध, सिख, इसाई 
हिन्दू और मुसलमाँ हूँ,
दिल में बस जाता हूँ,
वैसे सारा आसमाँ हूँ! 

है मोहब्बत मेरी जागीर,
फ़िक़्रों में पनाह हूँ,
मुस्कुराहटें हो जहाँ, 
यारा, मैं वहां हूँ!

सियासत-ओ-ताकतों
में मैं कहाँ हूँ?
मत ढूँढ मुझे महलों में,
मैं तो ग़रीब का मकाँ हूँ!

मिल जाऊं तो भुला दूँ सरहदें,
मैं तो पूरा जहाँ हूँ,
जहाँ हर कोई अपना सा लगे,
मैं वो नजरिया हूँ! 

मंदिर में हूँ या मज़्जिद में,
पूछता है के मैं कहाँ हूँ,
बस मोहब्बत भरे दिलों में रहता हूँ,
मैं तो सबका खुदा हूँ! 



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