शनिवार, अप्रैल 15

दूर चले गए


मेरा नाम जपते-जपते,
वो मुझसे दूर चले गए,
मुझे अपनी पसंद में ढालते -ढालते 
मेरे वजूद से दूर चले गए...

मुझे बेचते-बेचते,
वो कहाँ से कहाँ चले गए,
मैं यहाँ इंतज़ार में हूँ उनके,
जो घर से मेरे दूर चले गए...

मेरी मुहोब्बत बांधते-बांधते,
मज़हबी नामों-ओ-इमारतों में,
वो आज़ादी-ए -मुआफ़ी से
बहोत होते दूर चले गए...

मैं आवाज़ देते-देते,
थक गया हूँ उन्हें,
मेरे नाम से जो बुलाते हैं दूसरों को,
वो ख़ुद क्यों मुझसे दूर चले गए?

शायद मुझे ढूँढ़ते-ढूँढ़ते,
मेरी पहचान ही भूल गए,
मैं तो सबका हूँ, सब मेरे,
वो मेरी सच्चाई से दूर चले गए....!


एक टिप्पणी भेजें

    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!