बुधवार, मई 25

खट्टी-मिट्ठी गुड़िया

जानती हूँ की उपरी खूबसूरती फानी है,
फिर भी शीशे में खुद को निहारती हूँ

जहाँ दास्ताँ-ए-ज़िन्दगी लिखी जा रही है,
चेहरे की उन लकीरों से घबराती हूँ

पता है के यह हीरे-मोती नहीं हैं मेरी दौलत,
मगर फिर भी इनसे दिल लगाती हूँ 

न काली हूँ, न गोरी हूँ,
अपने भूरेपन पे इतराती हूँ

तमाम गुनाहों के बाद भी जो जिंदा है,
उस मासूमियत पे चकराती हूँ 

सच्चाई है बुनियाद मेरी ज़िन्दगी की, मगर
 कभी-कभी मुस्कराहट में उसे छिपाती हूँ 

हार जाती हूँ लाखों-करोड़ों के दुःख के आगे,
किसी एक दिल को छुलूँ तो मुस्कुराती हूँ

लफ़्ज़ों में बुन लेती हूँ दिल की गहराइयों को,
यूँ इज़हार-ऐ-एहसास कर पाती हूँ 

न मुकम्मल मैं हूँ न ज़िन्दगी है,
उसके रहम-ओ--करम पे जीती जाती हूँ
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