रविवार, मई 22

इंतज़ार, अँधेरा और अकेलापन

आज कुछ फर्क तर्ज़ पे लिखा है... बड़े दिन से कोई ब्लॉग पे नहीं आता... आतें भी हैं तो बिना कुछ कहे चले जाते हैं... आप सब की कमी को यहाँ लफ़्ज़ों में बुन दिया...

कभी महफ़िल हुआ करती थी यहाँ,
अब सब है धुआं-धुआं,

इंतज़ार, अँधेरा और अकेलापन
बसता है अब यहाँ 

किसी की आहट, कोई दस्तक,
किसी का आना, कहाँ होता है अब यहाँ

शायद इस कुँए में वो मिठास ही नहीं रही  
के कोई प्यासा रुकता यहाँ 

बस बेरंग पर्दों से खेलती है हवा आजकल,
शमा कहाँ जलती है अब यहाँ

साज़ खामोश ही रहते हैं अक्सर,
मोसिक़ी-ए-ख़ामोशी बजती है अब यहाँ 

सब कद्रदान हो गए रुख्सत रफ्ता-रफ्ता
उम्मीद फिर भी घर बनाये बैठी है यहाँ 

वो गलीचे-ओ-कालीन तो फ़ना हो गए
आनेवालों के लिए नज़रें आज भी बिछीं हैं यहाँ 

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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!