राज़-ए -दिल

मेरे राज़-ए -दिल सेहरा-ए -ज़िन्दगी में महफूज़ रहे,
मैं रेत पे लिखती रही, हवाएं मिटाती रहीं। 

कोई समझे भी क्यों मेरे दिल की बात,
मैं ही तो हमेशा हसरतें-ए -दिल सबसे छिपाती रही।

हर बात का एक क़द होता है,
बौनी बात छिपाती रही, ऊँची बताती रही।   

के कह भी दूँ और समझ भी न आये,
कई बातें यूँ शायरी में सजाती रही।  

एक आध राज़ इतने पेचीदा रहे,
के खुद से भी कहने से हिचकिचाती रही। 

टिप्पणियाँ

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (18-09-2019) को    "मोदी स्वयं सुबूत"    (चर्चा अंक- 3462)    पर भी होगी। --
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
 --
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
sanu shukla ने कहा…
behatreen rachna
मन की वीणा ने कहा…
बहुत उम्दा लेखन।

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

इस शहर के शजर

प्यास

वक्त के निशाँ