मंगलवार, मई 1

खुदा से और खुद से गुफ्तगू में वक़्त गुज़र जाता है,
तन्हाई से रूबरू होने का मौका ही नहीं  मिलता...

 
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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!