इस शहर के शजर


इस शहर के कई शजर सूख गए हैं,
अब अब्र नहीं बरसते, आब नहीं बहता है,
नमी की कमी है ज़मी में आजकल,
मट्टी की सीना सुबकता रहता है।  

यह शहर इतना ख़ुश्क हो गया है,
के एक शरर से आग फैल जाती है,
हर बशर जल रहा हो जैसे,
आग इंसान को इंसान से जलाती जाती है। 

यह सब बस तकदीर ने नही किया,
इस तदबीर को उसी ने अंजाम दिया,
जिस ने नदी का मुँह बंद किया,
और दरिया से मुँह फेर लिया।

मगर वो शजर आज भी खड़े हैं,
बोहोत गहरी जिनकी जड़े हैं,
एक नदी के रुकने से, वो नहीं सूखते,
ऐसे सूखे से वो पहले भी लड़े हैं!

और हाँ, वो नदी भी 
ज़्यादा देर नहीं रुकेगी,
हरा के ज़ालिम की बेड़ियाँ,
फिर ज़मीं को हरा कर देगी!

नए पौधे दरख्तों में बदल जाएंगे,
फिर आब-ओ -हवा ताज़ादम होगी,
रास्ते फिर एक-दुसरे से हो कर गुज़रेंगे,
ये सुनहरी मट्टी फिर से नम  होगी!

Photo credit: https://whyy.org/episodes/the-future-of-trees/




टिप्पणियाँ

वाह लाजवाब सृजन।
Ravindra Singh Yadav ने कहा…
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" ( 2015...लाख पर्दों में छिपा हो हीरा चमक खो नहीं सकता...) पर गुरुवार 21 जनवरी 2021 को साझा की गयी है.... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

उम्मीद हरी रहे
सुन्दर भावाभिव्यक्ति
Anuradha chauhan ने कहा…
बहुत सुंदर रचना
अनीता सैनी ने कहा…
वाह!बहुत सुंदर सृजन।
बहुत अच्छी रचना । हक़ीक़त के आईने में उम्मीदों का अक्स ।

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