नफरत की रोटी

ये कविता हर उस उपद्रवी भाई के लिए है जो गुस्से में आकर सड़क पर उतर तो जाता है मगर असल में उसकी किसी से भी कोई दुश्मनी नहीं होती।  उस के घर में भी वही संघर्ष होते हैं जो उन लोगों के यहाँ होते हैं जिन्हे वो धर्म या जात  के नाम पर तबाह करने जाता है।  सच तो है की उस की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी उन्ही लोगों से ज़्यादा मिलती है बनिसबत उनसे जो उसे सड़कों पे उतरने को उकसाते हैं। वो अपने जीवन को दांव पर लगा कर, लोगों को मार कर या उन्हें बेघर कर के जब वापिस अपने घर पहुँचता है तो उसकी खुद की ज़िन्दगी वहीं की वहीँ खड़ी होती है, या फिर और बदतर हो चुकी होती है। अपने घर में माँ, पत्नी, बच्चे डरे हुए होते हैं, उसके नए रूप पर सवाल उठाते है /  हाँ, जिन्होंने उसे उकसाया होता है, उन्हें promotion मिल जाती है! मैं उन सारे जवानों से अपील करती हूँ की वो सोचें, अपने-अपने दिलों में झांके, क्या दूसरों बर्बाद करने के बाद वो खुश हैं, उनके घर वाले पहले से बेहतर हैं? अगर नहीं, तो दोस्त, ये रास्ता ठीक नहीं है, न तुम्हारे लिए, न तुम्हारे घरवालों के लिए।  जहाँ तक दुसरे धर्म वालों को सबक सिखाने की बात है , ये  सिर्फ मरने-मारने से नहीं सिखाया जा सकता। तुम अपने बड़प्पन और बाहुबल को अपनी अच्छाई और धैर्य से भी दिखा सकते हो।  अटल, गाँधी, विवेकानन्द ,अब्दुल कलम आज़ाद, सईद शाहनवाज़ हुसैन, ये सब बिना हिंसा के ही बड़े माने  गए।  और सबसे बड़ी बात, तुम्हें अपना घर, अपने घरवाले देखने हैं, अपने खुद के सपने, जो तुमने बचपन से देखे हैं, वो पूरे करने हैं।  उन सपनों को किसी भी नेता की कूटनीति के लिए बलिदान देने की कोई ज़रुरत नहीं है।  वो बार-बार , अलग-अलग जगह, घरों को तबाह करवाते हैं मगर उनकी ताकत की हवस कभी ख़त्म नहीं होती। तुम अपनी गली में शांति और अमन ढून्ढ के ले आओ, बस! इसी में सबकी भलाई है, दोस्त! 
Photo credit: Hindustan Times


तू कौन है,
क्या है तेरी सच्चाई?
क्या चाहिए तुझे,
एक बार सोच तो सही!

अपने दिल की बात,
सुनी है कभी?
कुछ ख्वाहिशें होंगी,
तेरी अपनी भी?

क्या नहीं चाहता 
दिल की तस्सल्ली?
बच्चों के लिए,
नहीं चाहिए तरक्की?

भड़काने वाली बातें
हैं बिलकुल खोकली,
किसी को मारने से 
ज़िन्दगी नहीं चलती!

किसी के घर की राख में,
क्या शान है अपनी?
किसी के अँधेरे पे
नहीं पलती रौशनी!

नफ़रत तो चली आएगी
दरवाज़े से अंदर भी,
बहार की हवा तो 
आएगी घर में भी!

बच्चों को खिलाएगा
क्या नफरत की रोटी?
उनके मातम के शोर में,
सो सकेगी क्या बेटी?

न, मत दे जवाब,
मुझे कोई बहस नहीं करनी,
गहरी साँसे ले, दिल में झाँक,
बस इतनी है बिनती। 

याद रख, तेरी जीत
नहीं है हार किसी की,
किसी का ग़म नहीं
बढ़ाता तेरी ख़ुशी! 

इस तमाशे में
मत खो अपनी ख़ुदी,
किसी की ताकत की हवस में,
मत  भूल अपनी हस्ती।  

तू कौन है,
क्या है तेरी सच्चाई?
क्या चाहिए तुझे,
एक बार सोच तो सही!

टिप्पणियाँ

बहुत सुन्दर।
सोदेश्य लेखन।

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