गुरुवार, जनवरी 9

आज की नारी

मै ज़िम्मेदार हूँ,
मै ही कभी उस  बलात्कारी को 
रोक नहीं पायी,
चुप देखती रही,
अपने चारों तरफ,
आदमी का चिल्लाना,
औरत के आदर को कुचलना,
औरत हो कर औरत को दबाना,
मैं ही अपने बेटे,
नहीं सिखा पायी,
औरत का सही आदर,
घर में, बस में,
सड़क पे, दूकान पे,
हर शहर, हर तरफ,
जाने कितनी बार,
औरत को इन्साफ के लिए
भटकते देखा,
आँखों में आंसूं देखे,
मगर देख कर भी अनदेखे कर दिए,
उसकी दर्दभरी कहानी,
सुन कर भी अनसुनी कर दी,
कितनी बार, कितनी ज़िंदगियाँ,
सिसक-सिसक के ख़त्म हो गयीं,
मैं सोचती ही रही,
दिल टूटा कई बार,
मगर कुछ किया नहीं,
जब खुद पर ज़ुल्म हुआ,
तब ही किसी को सज़ा न दे सकी,
सर झुका के दूर चली गयी,
तो किसी और के हक़ के लिए क्या लड़ती,
बस सोचती ही रही...
हे, आज की नारी, तुझ को नमन,
तू जो सड़कों पर उतरती है,
बुलंद आवाज़ से
ज़ालिम को ज़ालिम कहती है,
नहीं डरती डंडो से तू,
नहीं डगमगाती,
उनके गंद उगलने से,
नहीं हिचकिचाती,
चाहे फिर वर्दी बीच में आये,
नहीं इंतज़ार करती
किसी लीडर का,
बस चल पड़ती है,
हक़ की लड़ाई में,
खुद के और औरों के लिए
हिम्मत से लड़ती है,
फिर कोई सामने आए,
तू पीछे नहीं हटती,
सुन, मैं तेरे पीछे ही हूँ,
मैं जानती हूँ,
दरवाज़ा बंद कर,
तू भी कभी-कभी रोती है,
तेरा भी सीना जलता है,
खून बहता है,
तो दर्द भी बोहोत होता है,
पर याद रख,
जब वो सोचते हैं,
तेरी गरिमा को चोट पहुंचा रहे है,
वो असल में तेरी शान में
चार चाँद लगा रहे हैं,
दिल ही दिल में
तेरा लोहा मान रहे हैं,
तुझे सलाम करती हूँ,
मेरी गुड़िया,
तू यूँ ही लड़ना,
यूँ ही मज़बूती से
आगे बढ़ते जाना,
फिर किसी कमज़ोर
को गिरने नहीं देना,
कुछ भी हो,
अपनी आवाज़ को
घुटने नहीं देना,
ये तेरा दौर है,
तू ही लीडर है,
नहीं कोई और है,
तू ही लीडर है,
नहीं कोई और है!




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