याद रहे, अँगरेज़ चले गए!

आज़ादी के वक़्त,
तो बंटवारे और खून-खराबे का इलज़ाम
हमने अंग्रेज़ों पे लगा दिया,
आज की नफरत के लिए
कौन ज़िम्मेदार है?
कोई पार्टी?
कोई  नेता?
या हमारे ही दिल में
'उनके' लिए
दिल में छिपा
वो नजरिया, वो बातें,
जो कभी ज़बाँ पे तो नहीं आतीं,
मगर जब शहर में आग लगे,
हम भी अपने दिल की चिंगारी
उस में चुपके से मिला देते हैं,
कभी अपने लफ़्ज़ों से,
तो कभी अपनी चुप्पी से!
कब तक सियासत के
कंधे पे रख कर,
हम अपनी कालिख़ की
पिचकारी चलाते रहेंगे?
सच तो यह है के
दिल ही दिल में
ये भी समझते हैं के
माँस खाने वाला भी
भगवान् को प्यारा होता है,
और नमाज़ न पढ़ने वालों पर भी
अल्लाह रहम करता है,
फिर क्यों गुटबाज़ी करतें हैं,
क्यों ढकोसलों में पड़ते हैं?
अरे, जब जानते हैं
के वो फ़र्क़ तो हैं,
मगर दुश्मन नहीं,
फिर क्यों सुनी-सुनाई बातों,
पे अमल करते हैं?
यह हिंदुस्तान की मिटटी है,
इसमें तो हर रंग मिल जाता है,
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हिंदुस्तानी तहज़ीब में,
हर कोई गले लगाया जाता है,
याद है, एक वक़्त था,
जब मोहल्ले वाले मिल कर,
सब मसले सुलझा लेते थे,
और आजकल लोग मिल कर,
किसी को मार देते है,
किसी की आबरू छीन लेते हैं,
और हम हैं की उस पर भी
मज़हब देख के सवाल उठाते हैं!
यार, हम नहीं थे ऐसे,
जागो, हम नहीं हैं ऐसे!
और याद रहे, इस बार अँगरेज़ नहीं हैं,
के जिन पर हम अपनी
गलतियों को थोप सकेंगे!

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