शुक्रवार, अक्तूबर 12

कठपुतली



कहते हैं ज़िंदगी छोटी सी है,
दिल की सुनो,
फिर वही दिल फ़र्ज़ों में
ज़िंदगी उलझा देता है।
अपनी करो भी तो
अपनी कहाँ चलती है?
ये जहाँ अपनी करवाता है,
तु अपनी करवाता है!
मैं खिलौना हुँ सबका,
या ये सब कोई खेल है?
मुझे नचा भी रहें हैं, और
ना थमने की तोहमत भी लगा रहें हैं!
मैं खेलूँ या जियूँ,
दौड़ूँ या नाचूँ?
अगर मैं ही ज़िम्मेदार हूँ,
अपने क़दमों के लिए,
तो मुझे रोकने,
इतने अड़ंगे क्यूँ भेज दिए?
या तो मैं हुँ, या फिर बस तु है,
मै , मेरा दिल,
सब खेल का हिस्सा है,
बस तु और तेरी डोरियाँ हैं,
जिनसे तु मुझे नचाता है....








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