शुक्रवार, दिसंबर 11

नहीं शिकायत किसी मज़हब से मुझे,
बस कोई खुदा को अपनी जागीर न समझे,
हर इंसा को जिसने बनाया,
उसे बस अपनी बातों-ओ-किताबों में ही हाज़िर न समझे 


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दिल्ली, सर चढ़ा है तेरा जादू

मुसलसल हलकी-हलकी हुड़क है, तेरी सम्त जाती मेरी हर सड़क है, मेरी कायनात का मरकज़ है तू आरज़ू शब-ओ-रोज़ है तेरी, तू माशूका नहीं,...