मंगलवार, अक्तूबर 20

आओ लौट चलें

कई न्यूज़ चैनल बदल के देख लिए, देश की हवा कुछ-कुछ बदली-बदली सी लगती है। ऐसा नहीं है  इस तरह के हादसे पहले नहीं हुए, आज भी याद है १९८४ की बर्बरता या गोधरा की मार्मिक कहानियाँ। मगर इस तरह आये दिन धार्मिक कट्टरता के किस्से पहले कभी नहीं सुने। यहाँ तक के भारत के राष्ट्रपति महोदय ने भी अपनी चिँता व्यक्त करी है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सवाल उठाये जा रहें हैं।


बड़ा अजीब लगता है जब भारत के बारे में ऐसी बातें कही जाती हैं क्यूंकि यहाँ तो, कुछ अपवादों को छोड़, सदियों से तरह-तरह के धर्म के लोग मिल-जुल के रहते रहें हैं और हम जानते है के रहते रहेंगे भी :-)


बस आजकल मन कुछ दुखी है.…  


यह ख़बरें क्यों जल रहीं हैं?
लफ़्ज़ों की तलवारें क्यों चल रही हैं?
क्या उजड़ रहा है चमन धीरे-धीरे?

नहीं, मेरा हिंदुस्तान हार नहीं सकता
भाईचारे को नफ़रत पे वार नहीं सकता,
नयी हवा से लड़ रहा है वतन धीरे-धीरे! 

हाँ, फ़ूलों  के रंग-ओ-खुशबु जुदा हैं,
मगर सब ही खूबसूरती-ए-गुलिस्तां हैं,
बात इतनी भी पेचीदा नहीं, समझेगा सनम धीरे-धीरे 

यह जज़्बात जिन्हे भूख है दरिंदगी की
क्या इनसे कम है कीमत ज़िन्दगी की?
कर रहें कई नेता इन्हें नमन धीरे-धीरे 

माँस नहीं, दाल-भात ही सही,
हाँ, और मिले सबको बराबरी  
ख़ाली बातों से हो रही है थकन धीरे-धीरे 

क़ानून हाथों में ले रहीं हैं अफ़वाहें,
इन्साफ घर में न पाएँ तो कहाँ जाएँ?
क्यों हो रहा है हक़ों का दमन धीरे-धीरे? 


रोक लो इनको,
कहो, बस करो,
अमन का करो जतन धीरे-धीरे  

छोड़ दो खोखली नफ़रत के बहाने,
कई पीढ़ी हमें यह रिश्ते हैं निभाने,
बढ़ने दो मोहब्बत की तपन धीरे-धीरे

मज़हब के नाम पे जो मचाया है  हल्ला,
नहीं मौजूद इसमें कहीं ईश्वर-अल्लाह, 
आओ लौट चलें राह-ए-दीन-ओ-धरम धीरे-धीरे 

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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!