गुरुवार, मार्च 5

गुज़ारिश

कहते हैं कुछ बातें अनकही ही अच्छीं, कुछ एहसास बिन इज़हार ही बेहतर :-)


मुझे माफ़ कर देना,
गर लफ्ज़-ओ-आवाज़ न दे सकूँ तुम्हें,
पड़े रहना मेरे ज़हन की तहों में,
कट जाएगा वक़्त करवटें बदलते,
मुस्कराहट की ओट में ही रहना, 
बाहर झांकों जो कभी चेहरे से,
बिखर जाना हवा में यूँ,
होठों पे आना तो आह बन के,
पलकें ओढ़े ही रहना,
गर उतर आओ कभी आँखों में,
जो न रह सको दिल में और ज़्यादा,
गालों पे लुढ़क जाना आबशार बन के,
तुम्हें कहना, तुम्हें सहने से भी मुश्किल होगा
मेरे एहसासों दम तोड़ देना, ज़बाँ पे अाने से पहले



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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!