मंगलवार, जनवरी 6

मुझे समझ न सकेगा तू

 बैसाखी की ज़रुरत पड़ती है मेरे होठों को अक्सर,
मेरी आँखें न पढ़ सकेगा तो मुझे समझ न सकेगा तू.…

लफ़्ज़ों में न बयाँ हो पाएगी कहानी मेरी,
मेरी ख़ामोशी न सुन सकेगा तो मुझे समझ न सकेगा तू.…

सिमटे हुए हैं एहसास-ओ-ख़्वाब मेरे अंदर,
मेरे ज़हन की परतें न खोल सकेगा तो मुझे समझ न सकेगा तू.… 

न जता पाएँगे मेरे हौसले अपनी गुंजाईश,
मेरे ज़ख्मों के निशां न गिन सकेगा तो मुझे समझ न सकेगा तू.… 

तोला गया है कई पैमानों में मेरा वजूद 
उसकी रेहमत न देख सकेगा तो मुझे समझ न सकेगा तू.… 
एक टिप्पणी भेजें

    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!