शुक्रवार, नवंबर 7

नज़रिया

इधर आजकल मन बहोत उदास सा है, मगर ऐसा नहीं है की खुशियाँ  नहीं हैं। कभी बीती यादेँ सताती हैं, तो कभी कुछ और :-) और दिल इतना निक्कमा है की बरकतेँ गिनना भूल कर हर छोटी बात पे हाय-तौबा मचाने लगता है.…

ख़ुशी और ग़म, मोहब्बत और शिकायत,
साथ साथ ही पलते हैं,
खट्टे-मीठे जज़्बात,
अक्सर साथ ही चलते हैं

काश एहसासों को हम
एक दुसरे से जुदा कर पाते ,
मगर ये एहसासात,
अक्सर साथ ही उभरते हैं 

भीगी आँखें जब मुस्कुराती हैं,
तो गज़ब लगती हैं,
उनकी नमीं में कई इज़हारात 
अक्सर साथ ही झलकते हैं 

न कोई वक़्त सिर्फ खुशनुमा होता है,
न कोई लम्हा कतई ग़मज़दा,
ज़िन्दगी में मुख्तलिफ हालात,
अक्सर साथ ही पनपते हैं 

सोचने लगो तो जैसे 
ख़यालों की झड़ी सी लग जाती है,
ज़ेहन से तरह-तरह के ख़यालात 
अक्सर साथ ही गुज़रते हैं 

इसलिए ज़रूरी है के 
नज़रिया नज़ारे से बड़ा हो क्यूंकि,
आबपाशी-ओ-सैलाब के बादल, हज़रात,
अक्सर साथ ही बरसते हैं



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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!