गुरुवार, नवंबर 6

सफ़र

कल फिर तुम मिले,
बड़ा अच्छा लगता है तुमसे मिलके,
मेरी दुनिया जैसे पूरी हो जाती है,
मगर फिर सुबह हो जाती है,
या आँख खुल जाती है,
फिर तुम नहीं होते,
दिल्ली भी नहीं होती,
बस हक़ीक़त होती है,
'आज' होता है,
सपनों में कल में लौटती हूँ,
और नींद टूटने पर आज में,
यह सफ़र थका देता है, पापा

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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!