सोमवार, अक्तूबर 27

मिशन मोहब्बत!

विदेशियों की बगल में हवाई जहाज़ की सीट पे आलती-पालती मार के बादलों से उलझते हुए हिंदी के अक्षरों में अपनी ज़िंदगी और उसके मकसद को सोचने का अलग ही मज़ा है... अक्सर सोचती हूँ, क्यों जाती हूँ अपनों को छोड़ कर बार बार? घर पर हर तरह का आराम है फिर क्यों निकल जाती हूँ गाँव-गाँव और शहर-शहर की ख़ाक छानने? वो तो भला हो घर वालों का जो जाने देते हैं और लगातार हर तरह से समर्थन करते हैं। नौकरी करते अब करीबन १५ साल हो गए, न तो कोई भारी बैंक अकाउंट बना पाई और न ही कोई खास संपत्ति। रेड क्रॉस की नौकरी वैसे भी पैसे के जुटाने के लिए नहीं करी, हाँ रोज़मर्रा की ज़रूरतें ज़रूर पूरी हो जातीं हैं।  वो तो भला हो दफ्तर वालों का जो रिटायरमेंट के लिए पैसे जमा करते हैं हर महीने जो शायद बेटे की आगे के पढ़ाई में काम आ जाएँ।

भारी भरकम बैंक अकाउंट हो या न हो, दिल को इतनी तस्सली ज़रूर है की ज़िंदगी के आखिरी दिन तक गरम-गरम दाल-चावल मिल ही जाएंगे, और न भी मिले तो ठन्डे से भी काम चल ही जाएगा :-) मगर इस रास्ते पे दुआओं, प्यार और दोस्तों की कमी नहीं है।  अगर धन संपत्ति इन सब से आँकी जाती तो शायद में दुनिया सबसे अमीर लोगों में मेरा शुमार होता।  ईश्वर की दया है जो दुनिया की किसी भी कोने में क्यों न जाऊँ, प्यार और आदर की कमी नहीं रहती। उसको तरह-तरह के रूप में पाया है, गोरे में, काले में, स्वाहिली बोलने वाले में और अरबी बोलने वाले , बच्चों में कभी  तो कभी बड़ों में। हाँ, यह है की ग़रीबी में ज़्यादा मिलता है, शायद सोने-चाँदी का शौक नहीं है उसे। मोहब्बत करता है हर किसी से और चाहता है हम भी मोहब्बत करें उससे और सबसे! मुझे भी उसी मिशन की ट्रेनिंग दे रहा है, शायद कभी इस मिशन को उसकी नज़र में मुक्कमल कर पाऊँ। (अशआरों और तस्वीरों के ज़रिए इस ट्रेनिंग की छोटी सी झलक)…

जहाँ रईसी है दोस्तों की, दुआओं की दौलत है,
अपना तो मिशन मोहब्बत है
मेरी मालदीव की सहेली: हमारी दोस्ती को अब करीबन १० साल होने वाले हैं :-)


रोते को हँसाने की चाहत है,
अपना तो मिशन मोहब्बत है,
छोटी बच्ची गुमसुम सी हेति में मिली, हमारे साथी इसके गाँव में काम कर रहे हैं।  


जहाँ भेद-भाव खो चुके अपनी हुकूमत हैं,
अपना तो मिशन मोहब्बत है
यह मुझे नामीबिया के एक गाँव में मिली, इन्होंने हम सबको प्यार की एहमियत बतायी 


नफरत से ही बस अदावत है,
अपना तो मिशन मोहब्बत है

यह अमरीका में मिली, बिलकुल मेरी बड़ी बहन जैसी 

माफ़ी ही बस ज़ख्म भरने की कीमत है,
अपना तो मिशन मोहब्बत है 

२००४ सुनामी के बाद, श्रीलंका के गाँव वालों के साथ बौद्ध स्तूप धोते हुए। इतना सब कुछ खो जाने के बाद भी उनके दिलों उस के लिए वही श्रद्धा थी, बहुत कुछ सीखने को मिला वहां। 


उसके बन्दों की खिदमत ही उसकी खिदमत है,
अपना तो मिशन मोहब्बत है

यह पुएर्टो रिको में मिले, मुझे माता-पिता की तरह स्नेह करते हैं 

जहाँ काफ़ी न कर पाने की खुद से शिकायत है,
अपना तो मिशन मोहब्बत है

यह बहन कुम्भकोणम, तमिल नाडु में मिली। उसकी छोटी सी बच्ची का स्कूल में आग लगने के कारण देहांत हो गया, मैं सान्तवना के अलावा कुछ भी नहीं दे पाई.…  

बस उसका करम और उसकी इनायत है,
अपना तो मिशन मोहब्बत है 
ये श्रीलंका की टीम के कुछ साथी, ऐसे ही साथियों के हौसलों और कोशिशों में ईश्वर  के प्रेम को देख पाती हूँ 

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