रविवार, मई 25

अक्सर अपने आप को भीड़ से जुदा देखा,
चहरों को नराज़ तो कभी हैरतज़दा देखा,
वो समझ न सके मेरे क़दमों का सबब,
मैंने इस फ़र्क़-ए-सोच में मंसूबा-ए-खुदा देखा 
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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!