शनिवार, मई 10

मेरा गुड्डू !

वो खो गया था,
फिर  कुछ पलों के लिए मिला था,
लगता है फिर खो गया है

मैं जानती हूँ मिल जाएगा फिर मुझे,
आगोश में लेलेगा फिर मुझे,
कोई सफाई नहीं देगा,
मोहब्बत से अपनी उलझा लेगा फिर मुझे,

पता नहीं कहाँ जाता है?
सैर पे निकलता है या खुद भी भटक जाता है?
चाहे कितने भी दिनों के लिए जाता है,
एक दिन लौट के ज़रूर आता है,

बस  खुश हो, शादाब हो,
हर अंधियारे एहसास से आज़ाद हो,
रस्ते पे होना कोई हादसा हो,
उसके कदम गुज़र जाने के बाद हो

उसके होने का फरमान आ गया है 
मेरा जहाँ फिर महक गया है,
आहट सी है, शायद घर का रास्ता मिल गया है,
खो गया था, लौट आया है 


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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!