बुधवार, नवंबर 20

हाँ, हम बदल गये…

फ़ोटो: गूगल 

पँछियों  कि तरह उड़ना चाहा, पर मेरे आसमाँ  कि हद तय कर दी गयी,
बहुत प्यार था उन धागों में जो न जाने कब ज़ंज़ीरों में बदल गए,

दुलार दर्द में बदल गया, प्यार-भरे बोल धमकियों में बदल गए,
तहज़ीब दीवारों में ढलने लगी जब रिवाज़ ईंटो में बदल गए,

झाँसी कि रानी और इंदिरा ने भी रौंदी थी सरहदें,
जब बेटी-बहु ने लांघी देहलीज़ तो सारे जज़्बात हथकड़ियों  में बदल गए,

उड़ने कि कोशिश इल्ज़ामों के बीच उलझ गयी,
सारे ख्वाब-ओ-हौसले एहसास-ए-गुनाहों में बदल गए,

जब हदों ने सारी हदें पार कर दीं, कोई हद नहीं रही फिर,
डर और कमज़ोरी के ख्याल हिम्मतों में बदल गए,

फिर सोच लिया कि बस अब उड़ना है, आगे बढ़ना है
दर-ओ-दीवारें खुली हवाओं में बदल गए,
फ़ोटो: गूगल 
आसमानों में खुदा को और क़रीब  से जाना,
इंसानों के इख्तयार उस कि रहमतों में बदल गए
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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!