शुक्रवार, जून 21

ज़रूरी तो नहीं

ुश हूँ, बस इतना पता है,
वजह समझना ज़रूरी तो नहीं

टूटता है दिल तो टूटा करे,
हर बात पे आँसूं  बहाना ज़रूरी तो नहीं  

चलते चलेंगे हम भी, सहरा हो या नखलिस्तान,
हर मोड़ पे मिले महखाना ज़रूरी तो नहीं
  
कल भी तो लाएगा अपने हिस्से की ख़ुशी,
आज पे हर दांव लगाना ज़रूरी तो नहीं
  
लफ़्ज़ों से खिलवाड़ कर लेते हैं थोडा बहोत,
हम भी ग़ालिब से शायराना हों ज़रूरी तो नहीं 

इमान--उम्मीद का साथ काफी है,
खुश रहने को कोई और बहाना ज़रूरी तो नहीं
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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!