गुरुवार, जून 20

कभी लगता है टूट के बिखर न जाऊं कहीं,
मगर यह तेरे रहम-ओ-करम की तौहीन होगी

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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!