गुरुवार, जून 20

कभी लगता है टूट के बिखर न जाऊं कहीं,
मगर यह तेरे रहम-ओ-करम की तौहीन होगी

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दिल्ली, सर चढ़ा है तेरा जादू

मुसलसल हलकी-हलकी हुड़क है, तेरी सम्त जाती मेरी हर सड़क है, मेरी कायनात का मरकज़ है तू आरज़ू शब-ओ-रोज़ है तेरी, तू माशूका नहीं,...