बुधवार, दिसंबर 5

रचतें हैं मज़हब मेरे नाम पे किस्म-किस्म के,
पूछें तो मुझसे मेरा कोई मज़हब नहीं
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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!