सोमवार, सितंबर 3

किस तरह समेट लूँ डब्बों में तुझको, ऐ घर, तुझे तो मेरी साँसों से लिपट कर चलना होगा...


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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!