सोमवार, सितंबर 3

किस तरह समेट लूँ डब्बों में तुझको, ऐ घर, तुझे तो मेरी साँसों से लिपट कर चलना होगा...


एक टिप्पणी भेजें

दिल्ली, सर चढ़ा है तेरा जादू

मुसलसल हलकी-हलकी हुड़क है, तेरी सम्त जाती मेरी हर सड़क है, मेरी कायनात का मरकज़ है तू आरज़ू शब-ओ-रोज़ है तेरी, तू माशूका नहीं,...