शनिवार, सितंबर 1

दुआ


आज से ठीक एक हफ्ते बाद हम पुएर्तो रिको से अमेरिका चले जाएंगे और ज़िन्दगी के एक नए अध्याय की शुरुआत करेंगे। ये वो वक़्त है जब दिल में कई तरह के ख़याल आते हैं, वाशिंगटन डीसी जैसे शहर में काम करना मतलब जीवन को नयी रफ़्तार से जीना  होगा। नए लोग, शायद नए लक्ष्य, न जाने क्या-क्या बदलेगा। मगर उसके क़दमों वही शान्ति, वही सुकून, वही तस्सली और वही स्पष्टता मिलती रहेगी। वो सुनेगा और जवाब देगा, और दुआओं का सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा। इस सिलसिले में आपका सबका साथ और सबकी हामी मिल जाए तो फिर हर दुआ अपनी मंजिल पा ही लेगी।


अमन के लिए दुआओं में 
मेरी दुआ भी जोड़ ले, ऐ  खुदा,
तू भी अमन ही चाहता है,
तेरी चाहत में मेरी चाहत भी जोड़ दे, ऐ  खुदा 


दुआ: गूगल फोटो 
अमन की बस बात नहीं,
हालात में असर ज़रा सा कर सकूँ,
जब लगे के क़दमों तले ज़मीं सरक रही है,
तेरे रहम पर भरोसा कर सकूँ 
मेरी हर राह को तेरी तरफ मोड़ दे, ऐ खुदा 

ग़म और गुस्से के ठीक बीच में,
मोजज़ा-ए-हंसी बन के मिलते रहना,
डर और नाउम्मीदी को हरा कर,
तस्सल्ली बन के दिल में बसते रहना, 
मेरे एहसासों की उम्र को ईमान से जोड़ दे, ऐ खुदा 


ज़िन्दगी के हर मकसद के 
मरकज़* में तुझे पाऊँ  
अपने दिल में तुझे ढूँढूं,
और हर बन्दे में तुझे पाऊँ,
मेरी आखों से तेरा नजरिया जोड़ दे, ऐ खुदा 

ज़िन्दगी पहाड़ों में हो, वादियों में या सहरा में,
दुआओं के दरिया में ताज़ा-दम हो सकूँ,
इतनी मोहब्बत दे दिल में, के
तमाम इंसानियत की हमदम हो सकूँ
मेरी मोहब्बत में तेरी मोहब्बत जोड़ दे, ऐ खुदा 

तेरी तारीफ़ बन जाऊं,
तेरी माफ़ी हकीक़त में पाऊँ,
बन जाए अमन का पैगाम,
तुझे इस तरह गुनगुनाऊँ,
मेरी साँसों को तेरी मर्ज़ी से जोड़ दे, ऐ खुदा

*मरकज़ = केंद्र
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