शुक्रवार, अगस्त 31

कभी लगता है यहीं मंज़िल है, कभी मंज़िल दूर तक नज़र नहीं आती… मानो मंज़िल ना हुई खुदा हो गयी...
एक टिप्पणी भेजें

दिल्ली, सर चढ़ा है तेरा जादू

मुसलसल हलकी-हलकी हुड़क है, तेरी सम्त जाती मेरी हर सड़क है, मेरी कायनात का मरकज़ है तू आरज़ू शब-ओ-रोज़ है तेरी, तू माशूका नहीं,...