मंगलवार, अगस्त 28

मुझसे नाराज़गी, मुझसे मोहब्बत की वो कमज़ोर लौ है जो बुझ कर भी बुझी नहीं... तेरी नाराज़गी, नाराज़गी नहीं, मेरी उम्मीद है...

 
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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!