गुरुवार, जुलाई 19

जब दिन थक कर रात की आगोश में सो जाता है,
मेरे ख्यालों के जुगनू यहाँ वहां फुदकने लगते हैं… 
जिन्हें पकड़ पाती हूँ, सजा लेती हूँ शायरी की बोतल में
इस तरह के बसीरत*-ए-हयात बन के चमकने लगते हैं…


बसीरत* = Insight
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दिल्ली, सर चढ़ा है तेरा जादू

मुसलसल हलकी-हलकी हुड़क है, तेरी सम्त जाती मेरी हर सड़क है, मेरी कायनात का मरकज़ है तू आरज़ू शब-ओ-रोज़ है तेरी, तू माशूका नहीं,...