गुरुवार, जुलाई 19

जब दिन थक कर रात की आगोश में सो जाता है,
मेरे ख्यालों के जुगनू यहाँ वहां फुदकने लगते हैं… 
जिन्हें पकड़ पाती हूँ, सजा लेती हूँ शायरी की बोतल में
इस तरह के बसीरत*-ए-हयात बन के चमकने लगते हैं…


बसीरत* = Insight
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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!