मंगलवार, जुलाई 17

लौ-ए-उम्मीद

वो ख़ौफ़-ऐ-सज़ा में बांधते रहें हैं तुझे,
तू  माफ़ी की खुली हवाओं में मिलता रहा है मुझे
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तेरे  नाम के कई ठेकेदार हैं, ऊँची इमारतों में रहते हैं,
तू सर्दी में ठिठरती रूहों में मिलता रहा है मुझे

किताबों में तू लिखा गया है बड़ खूबी से, मगर
ज़िन्दगी के हादसों में  साफ़ दिखता रहा है मुझे

मेरे अपनों ने भी इनकार किया मेरा, मगर
तू बड़ी मुहोब्बत से अपनों में गिनता रहा है मुझे

रिवाज़-ओ-रिवायतों में उलझी दुनिया समझे ना समझे,
तू ख़ामोश दुआओं में सुनता-ओ-समझता रहा है मुझे

अब ग़मों की गुफाओं से डर कम लगता है,
तू बन के अंधेरों में लौ-ए-उम्मीद मिलता रहा है मुझे

यूँ ही नहीं छू लेते दिलों को यह लफ्ज़ ,
तू मेरी शायरी में मिलता रहा है मुझे

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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!