रविवार, जुलाई 1

वो उधार की बात करता है,
कैसे उधार दूँ उसे जिसका क़र्ज़ अभी चुकाया नहीं

वो क़र्ज़ जिसमें बखुशी डूबी है ज़िन्दगी,
वो देता गया मुहोब्बत और कभी जताया नहीं




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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!