मंगलवार, जून 12

उसके क़दमों में सर मेरा, मेरा गुरुर है


चाहे ज़रा मैली भी हो,
मुझे मेरी सच्चाई ही मंज़ूर है

कहाँ तक साथ देगा धुंआ?
एक दिन तस्वीर साफ़ होती ज़रूर है

यूँ तो खुद्दार हूँ, सर उठा के चलने की आदत है,
उसके क़दमों में सर मेरा, मेरा गुरुर है

मज़हब तो समझता है, गर हमदर्दी भी समझ जाए,
तो पिघल जाए वो रहनुमा जो अभी मगरूर है


तहज़ीब-ओ-अदब जानता है सारे, माना
इंसान को गले लगाने का क्या तुझे शहूर है?


बैठ कुछ देर गरीब की कुटिया में और ढूंढ उसकी आँखों में,
पा लेगा उस खुदा को जो तेरे महल से ज़रा दूर है


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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!