शुक्रवार, जून 8

मुसलसल दर्द का ज़ाएका मीठा हो जाता है,

ख़त्म हो जाए तो कुछ कमी सी लगती है

सोचूँ खुशियाँ सारे जहां की मगर,

ख्याल-ए-उल्फत नम हो जाए तो कुछ कमी सी लगती है

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दिल्ली, सर चढ़ा है तेरा जादू

मुसलसल हलकी-हलकी हुड़क है, तेरी सम्त जाती मेरी हर सड़क है, मेरी कायनात का मरकज़ है तू आरज़ू शब-ओ-रोज़ है तेरी, तू माशूका नहीं,...