शुक्रवार, जून 8

मुसलसल दर्द का ज़ाएका मीठा हो जाता है,

ख़त्म हो जाए तो कुछ कमी सी लगती है

सोचूँ खुशियाँ सारे जहां की मगर,

ख्याल-ए-उल्फत नम हो जाए तो कुछ कमी सी लगती है

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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!