गुरुवार, अप्रैल 5

नींद


रोज़ रात आती है मुझे सुलाने,
पर हार जाती है ख्यालों के आगे,
फिर नींद आती है लंगडाती हुई,
जब दिल-ओ-दिमाग थक जाते हैं सवालों के आगे…. 


नींद छिप जाती है जब शायरी मुझ से मिलने आती है, 
कैसे समझाऊं इसे इतनी बेलज्ज़त भी ख्यालों की महफ़िल नहीं होती 

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