रविवार, अप्रैल 1

नदी हूँ

थम जाऊं, पहाड़ नहीं हूँ,
नदी हूँ, बहती चली जाती हूँ,
मायूसी का जोर नहीं चलता ज़रा देर,
उम्मीद का दामन थामे चली जाती हूँ….

Ganga River (photo from google)

पत्थर की ताकत नहीं मुझमे,
हाँ, प्यास बुझानी आती है,
टूटा नहीं करती, मगर
सिम्त-ए-धारा बदलनी आती है
कभी धीमे से कभी कल-कल चली जाती हूँ…

मेरे हिस्से में भी कंकड़ हैं
जल्दबाज़ी में अपने साथ बहा लाती हूँ,
जब थम-थम के बहती हूँ,
कुछ और निर्मल हो जाती हूँ,
केफ़ियत-ओ-कमियाँ लिए चली जाती हूँ…

प्यार की बारिश मुझे छू
ताज़ा कर जाती है,
पर यह बारिश ही कभी कभी
सैलाब भी दे जाती है
ऐसे में दुखती-दुखाती चली जाती हूँ…

ना बनूँ बरकत तो
बेकार है मेरा बहना ,
ना रुकूँ किसी सरहद पे,
उस दरिया तक है मुझे बहना,
पी से मिलने की चाह में बही चली जाती हूँ....

सबकी रहते हुए,
सिर्फ़ उसकी होना चाहती हूँ,
कुछ और मिले न मिले मुझको,
इस 'मैं' को खोना चाहती हूँ,
'मैं' नहीं पर अक्स दिखे बस तुम्हारा … यह अरमान लिए चली जाती हूँ…


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