रविवार, नवंबर 27

कौन कौन हूँ मैं?

अक्सर सोचती हूँ, क्या थी, कैसी हूँ अब, क्या ऐसी ही रहूंगी आने वाले कल में… क्यों मेरे संगी साथी इतने अलग-अलग हैं, डरती हूँ अपने अस्तित्व के लिए मगर चलती चली जाती हूँ विभिनता की ओर और समेटती रहती हूँ विभिनता अपने अन्दर… फिर याद आता है की वो भी तो अलग-अलग रंग में रिझाता है दुनिया को… साहस से भर जाती हूँ तब… शायद इस विभिनता में उस 'एक' से मिल जाऊं एक दिन….

कितनी सारी हूँ मैं, कौन कौन हूँ मैं?
सच हूँ, कभी झूठ, कभी मौन हूँ मैं

कुछ अपना सा हर जगह मिल जाता है
मन मेरा हर जगह घुलमिल जाता है
कैसे कहूँ, कौन हूँ मैं?

अपनी जड़ों से जुड़ी रहना चाहती हूँ,
असीम समीर सी बहना चाहती हूँ,
आवारगी या बंधन हूँ , कौन हूँ मैं?

खुदा की मुहब्बत में मज़हब से भागती हूँ,
कभी डर के तो कभी दलेरी से भागती हूँ,
कायर या इमानदार हूँ, कौन हूँ मैं?

रिश्ते बना लेती हूँ कोई मुल्क हो, कोई तहज़ीब,
वो अमल में जुदा सही, दिल के कितने क़रीब,
अजीब या मुनासिब हूँ, कौन हूँ मैं?

मुख्तलिफ माहोल में रम जाती हूँ,
बचपन की यादें भूला नहीं पाती हूँ,
माज़ी हूँ या आज हूँ, कौन हूँ मैं?

कभी बहन हूँ अफ्रीकन की,
कभी बेटी पुएर्तो-रिकन की,
दिल में हिंदुस्तान लिए, कौन हूँ मैं?

थोड़ी-थोड़ी सब की,
मगर पूरी कहीं नहीं,
कोई बताये, कौन हूँ मैं?

19 टिप्‍पणियां:

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

सहजता से धारा बही है मन के प्रश्नों की ...
सुन्दरता से व्यक्त की है भावना ...
बधाई.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

स्वयं को ढूढ़ते मन के तार, लगातार।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

स्वयं कि तलाश ...ऐसी रचना जो सबके मन से जुड जाए .. और पाठक स्वयं की तलाश शुरू कर दें

dheerendra ने कहा…

मन की उठती भावनाओं सुंदर प्रस्तुति,..
मेरे नए पोस्ट 'शब्द' में स्वागत है,....

Rakesh Kumar ने कहा…

थोड़ी-थोड़ी सब की,
मगर पूरी कहीं नहीं,
कोई बताये, कौन हूँ मैं?

आप उसकी अनुपम कृति हैं,अंजना जी.
वह सबका है और आप भी.
अभी थोडा थोडा लगता है आपको.
यकीं रहेगा तो पूरा भी लगेगा.

बूंद समंदर में मिल कब बूंद रहती है जी.

मेरे ब्लॉग पर आपके आने का दिल से शुक्रिया.

dheerendra ने कहा…

अंजना जी,
मेरे मुख्य ब्लॉग 'काव्यांजली'में
नए पोस्ट 'शब्द'में आपका इंतजार है...

रंजन (Ranjan) ने कहा…

wonderful!!!

Bhushan ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Bhushan ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Bhushan ने कहा…

मन की पर्तों को चित्रित करती कविता बहुत सुंदर बन पड़ी है. आपका यह ब्लॉग मैंने http://meraaggregator.blogspot.com/ ब्लॉग बग़िया में रख लिया है. अधिकतर http://meghnet.blogspot.com/ MEGHnet पर ही लिखता हूँ लेकिन अब पहले जैसे आलेख नहीं लिखता. इन दिनों थोड़ा आस्तिक-सा हो गया हूँ. इसके सलीके सीख रहा हूँ. ब्लॉग पर आने के लिए आभार गुड़िया.

S.N SHUKLA ने कहा…

सुन्दर , भावमयी रचना, बधाई.

वन्दना ने कहा…

जिस दिन ये जान लिया उसके बाद कुछ जानना नही रहेगा ।

M VERMA ने कहा…

स्वयं को तो स्वयं ही ढूढना होगा ..
सुन्दर भाव

संतोष कुमार ने कहा…

खुद की तलाश कभी कभी उम्र के उस पड़ाव पर ले जाती है जहाँ से मुड के देखने पर कई बार लगता है की ये तलाश तो जहाँ से शुरू हुई थी वहीँ पहुच गई !


सुंदर रचना !

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

mere vichar ने कहा…

कौन हो यह तो बाद का सवाल है पर हाँ लाजवाव हो आप...एक अच्छी कविता.

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…






आदरणीया अंजना जी
सस्नेहाभिवादन !

बहुत सुंदर मनोभाव -
अपनी जड़ों से जुड़ी रहना चाहती हूँ,
असीम समीर सी बहना चाहती हूँ,
आवारगी या बंधन हूँ , कौन हूँ मैं?

खुदा की मुहब्बत में मज़हब से भागती हूँ,
कभी डर के तो कभी दलेरी से भागती हूँ,
कायर या इमानदार हूँ, कौन हूँ मैं?

रिश्ते बना लेती हूँ कोई मुल्क हो, कोई तहज़ीब,
वो अमल में जुदा सही, दिल के कितने क़रीब,
अजीब या मुनासिब हूँ, कौन हूँ मैं?



जीवन में हम इतने रूपों में जीते हैं …
अलग-अलग रोल कभी इच्छा से , कभी मजबूरी से निभाने ही पड़ते हैं

पुनः अच्छी रचना के लिए साधुवाद !

मंगलकामनाओं सहित…
- राजेन्द्र स्वर्णकार

Anjana (Gudia) ने कहा…

sabhi ko dhanyawaad! :-)

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही सटीक भाव..बहुत सुन्दर प्रस्तुति
शुक्रिया ..इतना उम्दा लिखने के लिए !!