शनिवार, सितंबर 10

मेरी खुदगर्ज़ी


So the other day, as we were finishing supper, my husband asked me if I wanted to know how I looked. After a tiring day at work and being at the road for an hour, I knew I looked tired and shabby. I smiled and hoped he wouldn’t tell me what he thought. However, he got up and went to our backyard and brought a beautiful rose and said, “You look like this”.

Photo by Joe Prewitt

ऐसे हमसफ़र के लिए, यह एहसास-ओ-लफ्ज़ खुद-ब-खुद उभर आते हैं...




होठों पे तेरे लिये दुआ होती है 
मेरी खुदगर्ज़ी यूँ बयाँ होती है

तेरी खैरियत है मेरा खज़ाना
तेरी मुस्कराहट मेरी ख़ुशी का निशाँ होती है

जब-जब तेरे क़दमों के निशाँ साथ नहीं होते
मंजिल पे पहुँच के भी मंजिल हासिल कहाँ होती है

चाँद आ जाए हाथ या मुट्ठी में हो ख़ाक
तेरे होने से हर हक़ीकत एक दिलचस्प दास्ताँ होती है

उसकी रहमत और तेरा साथ काफी है
फिर कोई फिक्र हो, बस लम्हों में फ़ना होती है

सालों का साथ है फिर भी, जब-जब नज़र मिलती है
मोहब्बत एक बार और जवाँ होती है

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दिल्ली, सर चढ़ा है तेरा जादू

मुसलसल हलकी-हलकी हुड़क है, तेरी सम्त जाती मेरी हर सड़क है, मेरी कायनात का मरकज़ है तू आरज़ू शब-ओ-रोज़ है तेरी, तू माशूका नहीं,...