सोमवार, जुलाई 25

मिलावट के ज़माने में हम पीछे रहें क्यूँ 
उम्मीद मायूसी में मिला ली हमने 


बेईमानी का चलन अपनाया इस अदा से 
मुस्कराहट ग़म में मिला ली हमने 

गुस्से में जो नफरत घोलते हैं, घोला करें,
माफ़ी शिकायत में मिला ली हमने 




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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!