दिल भी कमाल करता है, जब खाली-खाली होता है, भर आता है
आमीन
फर्क ही नहीं होता हममें गरतो लज्ज़त कहाँ से आती?सरगम कैसे सजती,ये रंगत कहाँ से आती?चलो, इन्ही फ़र्कों में कहीं,एक से एहसास ढूंढे इसी एक अहसास से इंसानियत की शुरूआत होती है. आपकी रचनाओं में मानवीय गुणों का सागर हिलोरें ले रहा है.
अनुपम प्रार्थना।
आपकी दुआ कुबूल हो
तथास्तु
उत्तम!
hamare aur se bhi aameeeen:)
बेहतरीन कहा है ... ।
सच!...बेहतरीन
अस्वस्थता के कारण करीब 20 दिनों से ब्लॉगजगत से दूर थाआप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,
वाह!! क्या दुआ की है...
'तेरे क़दमों में जगह मिल जाये'इसका तात्पर्य भगवान की शरण से है.'ऊँचा' उठाने से मतलब कि हम स्वार्थ के गर्त से निकल सदा सद्विचार,सद्भाव रखते हुए सद्कर्म ही करें.आपने कुछ ही शब्दों में अध्यात्म का निचोड़ प्रस्तुत कर दिया है.मैं क्षमाप्रार्थी हूँ कि आपकी इस पोस्ट पर देर से आ पाया हूँ.सुन्दर प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार.
आमीन या रब्बल आलमीन !अर्थातहे सर्वलोकनाथ ! ऐसा ही हो !!आज आपको अनम बुला रही है 'प्यारी माँ' के पास !!!
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13 टिप्पणियां:
आमीन
फर्क ही नहीं होता हममें गर
तो लज्ज़त कहाँ से आती?
सरगम कैसे सजती,
ये रंगत कहाँ से आती?
चलो, इन्ही फ़र्कों में कहीं,
एक से एहसास ढूंढे
इसी एक अहसास से इंसानियत की शुरूआत होती है. आपकी रचनाओं में मानवीय गुणों का सागर हिलोरें ले रहा है.
अनुपम प्रार्थना।
आपकी दुआ कुबूल हो
तथास्तु
उत्तम!
hamare aur se bhi aameeeen:)
बेहतरीन कहा है ... ।
सच!...बेहतरीन
अस्वस्थता के कारण करीब 20 दिनों से ब्लॉगजगत से दूर था
आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,
वाह!! क्या दुआ की है...
'तेरे क़दमों में जगह मिल जाये'
इसका तात्पर्य भगवान की शरण से है.
'ऊँचा' उठाने से मतलब कि हम स्वार्थ के गर्त से निकल सदा सद्विचार,सद्भाव रखते हुए सद्कर्म ही करें.
आपने कुछ ही शब्दों में अध्यात्म का निचोड़ प्रस्तुत कर दिया है.
मैं क्षमाप्रार्थी हूँ कि आपकी इस पोस्ट पर देर से आ पाया हूँ.
सुन्दर प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार.
आमीन या रब्बल आलमीन !
अर्थात
हे सर्वलोकनाथ ! ऐसा ही हो !!
आज आपको अनम बुला रही है 'प्यारी माँ' के पास !!!
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