शनिवार, मार्च 12

ज़ख़्मी हूँ, बीमार हूँ मैं

ये कविता उन करोड़ों लोगों के लिए लिखी है, जो दिन प्रति दिन अपने पे किये अत्याचारों या उनके ज़ख्मों को जी रहे हैं. ये लोग रोज़मर्रा ज़िन्दगी में दिखते तो हैं पर दिखते नहीं.... आज भी यौन शोषण परदे के पीछे रहता है, गरीब की बेकद्री को ज़िन्दगी का एक हिस्सा समझा जाता है... जात-पात के नाम पर कभी सत्ता के नाम पर कभी विद्रोह के नाम पर हर रोज़ सैंकड़ों मर रहे हैं, औरतें विधवा हो रही हैं, बच्चे यतीम हो रहे हैं...

जब तक हम ये सोचेंगे की हाल इतना भी बुरा नहीं है तब तक कुछ करने के लिए जज़्बा नहीं जगेगा... 

ज़ख़्मी हूँ, 
बीमार हूँ मैं,
अपने ही अंशों की बदकारियों 
की शिकार हूँ मैं 

गरिमा, गैरत, इज्ज़त, आबरू
और हक़ है मेरी पहचान 
मगर हर वार कमज़ोर के अधिकार पर
ज़ख़्मी करता है मेरी पहचान  
इंसान के इंसान बनने का 
एक लम्बा इंतज़ार हूँ मैं 

ऐ औरत, निंदा तेरा गहना,
बलात्कार है तेरा तोफहा,
अक्सर दिन दहाड़े, 
होती है तेरी हस्ती तबाह 
कभी लगता है मैं, मैं नहीं
एक बेरहम बाज़ार हूँ मैं 


मुफ़लिस, चाहे 
आदमी हो या औरत
जानवर से भी 
गयी गुज़री है उसकी इज्ज़त 
गरीब की हर आह में छिपी
अपनी ही एक हार हूँ मैं 


सत्ता का लालच छिपाते हैं
उसूलों के रूमाल में
क्रांति कोई भी हो, सरकार कोई हो 
मरता है कमज़ोर हर हाल में 
बेइंसाफी, बेईमानी और ज़ुल्म से
घायल और बेज़ार हूँ मैं 

जानता है मेरी हालत  
मगर चुप रहता है
कभी आता है मदद को,
कभी बस देखता है 
ये क्या अदा है, कौनसा अंदाज़ है?
पूछती यही बार-बार हूँ मैं 


हाँ, बीमार हूँ,
घायल और बेज़ार हूँ मैं,
नींद से जागो, बचालो मुझे,
ढेहता हुआ दयार हूँ मैं,
मैं ख़त्म हो गयी तो तुम भी न रहोगे,
 मुझे पहचानो, इंसानियत हूँ मैं!

Photos Courtesy Google
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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!