मंगलवार, फ़रवरी 15

हिसाब कोशिशों का रखना फ़िज़ूल है

हर वो बादल जो छिपाता है
उम्मीद-ए-आफ़ताब को,
ज़मीन पे बहता देखोगे
हर एक बूँद-ऐ-आब को,

मायूसी समेट लेना चाहती हैं
ज़िन्दगी की किताब को,
बचा के रखना है इससे
उस सुनहरे ख्व़ाब को

इन्हीं चट्टानों में छिपा वो पत्थर भी है,
जुस्तजू ढून्ढ ही लेगी उस नायाब को,
तबाही के बाद भी तो फूटती हैं कोपलें,
कोई बहार ढूंढ ही लेगी दिल-ऐ-बर्बाद को

कब तक छुपेगा सलाम दुप्पटे में, एक दिन
हवा कर देगी ज़ाहिर पर्दानशीं आदाब को
हिसाब कोशिशों का रखना फ़िज़ूल है,
मंजिल पाकर फुर्सत ही कहाँ कामयाब को

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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!