गुरुवार, फ़रवरी 3

पापा के जूते

पापा के जूते
हमेशा चमकते रहते थे,
पलंग के पास बैठे-बैठे उनके तैयार होने का
मुस्तैदी से इंतज़ार करते रहते थे,
पापा गर घर पर हैं, तो जूते अपनी जगह पर,
उनके होने का निशाँ हुआ करते थे,
वैसे तो हमेशा वो अपने जूते
एक ही जगह उतारा करते थे,
कभी-कभी दूसरों की लापरवाही से,
उनके जूते पलंग के नीचे चले जाया करते थे,
बचपन में फट से घुटनों पे होकर,
भाई और मैं नीचे से निकाला करते थे,
पर जब हमारे कदम उनके जूतों से आगे निकल गए,
जाने कैसे पापा उन्हें निकाला करते थे
हाँ, हमेशा एक जैसे जूते ही खरीदते थे,
बिना फीते के जूते पसंद किया करते थे,
जब तक बहुत पुराने ना हो जाएं,
नए नहीं खरीदा करते थे,
जब कोई बीमार हो या मुश्किल में हो,
जूतों को जल्दी से पहन निकल जाया करते थे,
फिर धीरे धीरे जूते पहनना मुश्किल होने लगा,
कभी-कभी चप्पल में चले जाया करते थे,
पापा और चमकते हुए जूतों का साथ कम होने लगा
अब पापा ज़्यादातर घर में रहा करते थे,
जूते वहीँ बैठे बैठे
उनका इंतज़ार किया करते थे
फिर एक दिन उन्हें उनकी जगह से हटा दिया गया
क्यूँकी उनकी की जगह पंखों ने ले ली थी...

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